उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
पितासि राजन्पुत्रास्ते वृद्धस्त्वं शिशवः परे |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
पितासि लोकस्य चराचरस्य; त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीय़ान् |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
पितुः पितरमिष्टं वै धिगस्तु क्षत्रजीविकाम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
पितुः पितामहा ये च तथैव प्रपितामहाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
पितुः पुत्रेण संवादं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
पितुः प्रिय़हिते युक्तः स्त्रीभोगान्वर्जय़िष्यति |
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
पितुः संस्पर्शशीतेन गन्धमादनवाय़ुना ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
पितुः सकाशमगमद्देवी श्रीरिव रूपिणी ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
पितुः सखा च भवतः संमतः सत्यसङ्गरः |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
पितुः समीपे तिष्ठन्तं त्रिभिरन्यैरविध्यत ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
पितुः समीपे तिष्ठन्तं शूरमुद्यतकार्मुकम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
पितुः समीपे नरसत्तमस्य; मातुश्च राज्ञश्च तथाहुकस्य ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
शौनक उवाच
पितुः स्वर्गगतिं तन्मे विस्तरेण पुनर्वद ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
पितुरन्तःपुरं दद्यान्मातुर्दद्यान्महानसम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पितुराज्ञा परो धर्मः स्वधर्मो मातृरक्षणम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पितुराज्ञां कथं कुर्यां न हन्यां मातरं कथम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
पितुराश्लिष्यतेऽङ्गानि किमिवास्त्यधिकं ततः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
पितुरेतद्वचः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
पितुर्दैन्यमनिच्छन्तीं प्रीत्यापश्यत्ततो गिरिम् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
पितुर्निकारान्संस्मृत्य रणे कर्माकरोन्महत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
पितुर्निदेशादनघः स्वधर्मं; वने वासं दाशरथिश्चकार ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
पितुर्निर्यात्य तां कन्यां प्रय़यौ वनमेव ह ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
पितुर्निय़ोगाज्जग्राह शुको व्रह्मविदां वरः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
पितुर्निय़ोगात्त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
पितुर्निय़ोगादगमन्मैथिलं जनकं नृपम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
पितुर्निय़ोगाद्धर्मज्ञा शिरसावनता तदा ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
पितुर्निय़ोगाद्भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मनः ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
पितुर्मम सकाशे यं व्राह्मणः प्राह धर्मवित् ||
१२९ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
पितुर्ममांशो देवस्य सर्वलोकप्रतापिनः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
पितुर्मे यज्ञविघ्नार्थमहरत्पापनिश्चय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
पितुर्वचनमाज्ञाय़ तमेवार्थं विचिन्तय़न् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
पितुर्वचनमाज्ञाय़ निर्जगामाविचारितम् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
पितुर्वचो निशम्यैतद्धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
पितुर्वदनमन्वीक्ष्य परिवृत्य च धर्मवित् ||
१७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
पितुर्वधममृष्यंस्तु रामः प्रोवाच तानृषीन् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
पितुर्वधममृष्यंस्तु वक्ष्याम्यद्येह पौरुषम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
सगर उवाच
पितुश्च तेऽहं त्यागेन पुत्राणां निधनेन च |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
पितुश्च भरतश्रेष्ठ विदुरस्य च धीमतः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
पितुश्च मृत्युदुःखार्तोऽजहात्प्राणान्धनञ्जय़ ||
२८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
पितुस्तव महाराज सत्यसन्धो जनार्दनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
८
शकुनिरु उवाच
पितुस्ते वचनं तात न ग्रहीष्यन्ति कर्हिचित् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
पितृंश्च तारय़ामास सन्तत्या तपसा तथा |
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
पितृकार्यं करिष्यामि तत्र मेऽनुग्रहं कुरु ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
पितृकार्ये कृते चापि विसृष्टः स जगाम ह ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
राजो उवाच
पितृकार्ये त्वय़ा पूर्वमुपदेशः कृतोऽनघ |
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
पितृगन्धर्वभूतानां चक्षुर्विषय़वर्तिनाम् |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
पितृणां चैव सर्वेषां प्रजानामिव चन्द्रमाः ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
पितृतः प्राप्तवान्राज्यं पाण्डुरात्मगुणैः पुरा |
१४ क