chevron_left  पार्थेनarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
पार्थेन निर्जिता युद्धे त्वं च कर्ण सहानुजः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
पार्थेन परुषं वाक्यं सर्वमर्मघ्नय़ा गिरा |
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
पार्थेन प्रार्थितं वीरास्ते ददन्तु ममाभय़म् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
युधिष्ठिर उवाच
पार्थेन विजिता चैषा रत्नभूता च ते सुता ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थेन सममस्त्रेषु कस्तं द्रोणादवारय़त् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
पार्थेन सह धर्मात्मा गृणन्व्रह्म सनातनम् ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थेन सृष्टः स तु गार्ध्रपत्र; आ पुङ्खदेशात्प्रविवेश नागम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
पार्थेनैकेन निहताः सिंहेनेवेतरा मृगाः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
पार्थेरितैर्वाणगणैर्निरस्ता; स्तैरेव सार्धं नृवरैर्निपेतुः ||
५७ ख
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थैः प्रीतिसमाय़ुक्तैः पूजनार्होऽभिपूजितः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थैः संय़ुज्यमानस्य नेदुर्मत्स्यस्य वेश्मनि ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थो वाक्यार्थतत्त्वज्ञो जगौ वाक्यमतन्द्रितः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
पार्थो ह्येकोऽहरद्भद्रामेकश्चाग्निमतर्पय़त् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
पार्थोऽपि तानापततः समीक्ष्य; त्रिगर्तराज्ञा सहितान्नृवीरान् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
पार्थोऽपि भृशसंविद्धो ध्वजय़ष्टिं समाश्रितः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
पार्थोऽपि युधि विक्रम्य कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थोऽपि विश्रुतं लोके गाण्डीवं परमाय़ुधम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
पार्थोऽपय़ातः शीघ्रं वै विहाय़ महतीं चमूम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
पार्थोऽर्दय़द्राक्षसेन्द्रं स विद्धः प्राद्रवद्भय़ात् ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थोऽव्रवीन्न मे वध्या राजानो राजशासनात् |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
पार्थोऽहमस्मि तिष्ठ त्वं कर्णोऽहं तिष्ठ फल्गुन |
७० क
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थौ गृहीत्वा पाणिभ्यां भ्रातरौ सुमहावलौ ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
पार्वतीय़ा वलिं चान्यमाहृत्य प्रणताः स्थिताः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
पार्वतीय़ाश्च राजानो राजा चैव वृहद्वलः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
पार्वतीय़ाश्च विषमा यथैव गिरय़स्तथा ||
७९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
पार्वतीय़ैर्नदीजैश्च सैन्धवैश्च हय़ोत्तमैः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
पार्वतीय़ैर्महीपालैः सहितः पाण्डवानिय़ात् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
पार्वत्या सहितं देवं भूतसङ्घैश्च भास्वरैः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
पार्श्वतः केऽभ्यवर्तन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
पार्श्वतः सिन्धुराजस्य व्यराजन्त महारथाः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
पार्श्वतःकरणं प्रज्ञा विषूची त्वापगा इव |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
पार्श्वतो याहि राजानं युध्यस्व च वृकोदरम् ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
पार्श्वतोऽभ्यहनत्क्रुद्धो धृष्टद्युम्नस्य वाहिनीम् ||
६२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
पार्श्वतोऽभ्यहनन्पार्थं तव पुत्रस्य शासनात् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
पार्श्वतोऽभ्यागतो न्यस्तान्यथ निर्वेदमागतः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
पार्श्वस्थं सात्यकिं प्राह रथो मे युज्यतामिति ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
पार्श्वाननाश्च वहवो नानादेशमुखास्तथा ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
पार्श्वाभ्यां मरुतो देवान्नासाभ्यामिन्दुमेव च |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
पार्श्वे तस्योत्तरे दिव्यं सर्वर्तुकुसुमं शिवम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
पार्श्वे दशार्णाधिपतेर्भित्त्वा नागमपातय़त् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
विशोक उवाच
पार्श्वे भीमं पाण्डुराभ्रप्रकाशं; पश्येमं त्वं देवदत्तं सुघोषम् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
पार्श्वे शशस्य द्वे वर्षे उभय़े दक्षिणोत्तरे |
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
पार्श्वैस्तु दारितैरन्ये वारणैर्वरवारणाः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
पार्षतं च तदा तूर्णमन्यमारोपय़द्रथम् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
पार्षतं च महेष्वासं पीडय़ामास संय़ुगे ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
पार्षतं छादय़ामास घोररूपैः सुतेजनैः |
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पार्षतं छादय़ामास निश्चेष्टं सर्वमर्मसु ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
पार्षतं त्वभि सन्तस्थुर्द्रौपदेय़ा युय़ुत्सवः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पार्षतं प्राद्रवद्यन्तं महेन्द्र इव शम्वरम् ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
पार्षतं शत्रुदमनं शत्रुवीर्यासुनाशनम् ||
१८ ख