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वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
पापाणि विप्रणश्यन्ति नाकपृष्ठे च मोदते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
पापात्पापसमाचारान्निहीनाच्च नराधिप |
७ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
पापात्मा क्रोधकामादीन्दोषानाप्नोत्यनात्मवान् ||
७१ ख
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
पापात्मा पापभावश्च कामरागवशानुगः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
पापात्मा पापवुद्धिर्यः पापमेवानुवर्तते |
६ क
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
पापात्मा सोऽकृतप्रज्ञः सदैवेह द्विजोत्तम ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
पापानां च त्वमावासः कर्मणां मा पुनर्वद ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
पापानां विद्ध्यधिष्ठानं लोभमेव द्विजोत्तम |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
धृतराष्ट्र उवाच
पापानि कुर्वन्पापेन लिप्यते न स लिप्यते ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
पापानि तु नरः कृत्वा तिर्यग्जाय़ति भारत |
१०६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पापानि विप्रणश्यन्ति व्रह्मलोकं च गच्छति ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
पापानुगास्तु पापास्ताः पतीनुपसृजन्त्युत |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
पापानुवन्धं को नु तं कामय़ेत; क्षमैव ते ज्याय़सी नोत भोगाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
पापानुवन्धं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
पापान्मुक्तः पुनर्लव्ध्वा वुद्धिं चेतो धनानि च ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
पापान्यज्ञानतः कृत्वा मुच्येदेवंव्रतो द्विजः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
कामन्द उवाच
पापान्यपि च कृच्छ्राणि शमय़ेन्नात्र संशय़ः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
पापान्यवुद्ध्वेह पुरा कृतानि; प्राग्धर्मशीलो विनिहन्ति पश्चात् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
पापान्विवर्धतो दृष्ट्वा कल्याणांश्चावसीदतः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
पापान्सर्वैरुपाय़ैस्तान्निय़च्छेद्घातय़ेत वा ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
पापान्स्वल्पेऽपि तान्हन्यादपराधे तथानृजून् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
धृतराष्ट्र उवाच
पापाशङ्की पापमेवानुपश्य; न्पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
पापाय़ेव च सृष्टोऽसि कर्मणे ह यवीय़से ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
गालव उवाच
पापिष्ठेभ्यस्त्वनर्घार्हः स नरोऽस्तु स्वपापकृत् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
पापीय़सः क्षमेतैव श्रेय़सः सदृशस्य च |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
पापीय़सो नरान्यद्वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
पापीय़स्यो वहुतरा इतोऽन्याः पापय़ोनय़ः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
द्रौपद्यु उवाच
पापीय़ांस इमे भूत्वा सन्तीर्णाः पतय़ो मम |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
पापीय़ान्हि धनं लव्ध्वा वशे कुर्याद्गरीय़सः |
३० क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
पापीय़ान्हि स शूद्रेभ्यस्तस्करेभ्यो विशेषतः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
पापेन कर्मणा देवि वद्धो हिंसारतिर्नरः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
पापेन कर्मणा वित्तं लव्ध्वा पापः प्रहृष्यति |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
पापेन कर्मणा विप्रो धनं लव्ध्वा निरङ्कुशः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
पापेन तेन चास्पर्शं भ्रातॄणां प्रकृतिं तथा ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २६
व्राह्मण उवाच
पापेन विचरँल्लोके पापचारी भवत्ययम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
पापेन हि कृतं पापं पापमेवानुवर्तते |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
पापेनाभिहतः पापः पापमेवाभिजाय़ते ||
२९ ग
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पापेभ्यो विप्रमुच्यन्ते तद्गताः सर्वजन्तवः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडय़ेत् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडय़ेत् |
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
पापैः पापाः सञ्जनय़न्ति रुद्रं; ततः सर्वान्साध्वसाधून्हिनस्ति ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
पापैः पापे क्रिय़माणेऽतिवेलं; ततो रुद्रो जाय़ते देव एषः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
पापैः सह न सन्दध्याद्राष्ट्रं पण्यं न कारय़ेत् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
पापैः सहाय़ैः संहत्य निग्रहीतुं किलेच्छसि ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
पापैः सहाय़ैः संहत्य पापं कर्म चिकीर्षसि ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
पापो ध्रुवमवाप्नोति विनाशं नाशय़न्कृतम् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
पापोऽवलिप्तो वृद्धश्च नाय़ं भीष्मोऽर्हति क्षमाम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २३५
चित्रसेन उवाच
पापोऽय़ं नित्यसन्दुष्टो न विमोक्षणमर्हति |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
पाप्मानं निर्दहेदेवमन्तर्भूतं रजोमय़म् |
१४ क