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शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुभ्यः प्रोच्यमानोऽपि पित्र्यमंशं न दत्तवान् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
पाण्डुरं कार्मुकं गृह्य प्राय़ां भरतसत्तम |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुरं गजमारूढो गाण्डीवी स धनञ्जय़ः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरं गजमास्थाय़ तावुभौ समभिद्रवत् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरं पुण्डरीकाक्षः प्रासादैरुपशोभितम् ||
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरा रक्तपादाश्च विहगाः कालचोदिताः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुराभ्रप्रकाशाभिः पताकाभिरलङ्कृते ||
५७ ग
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुराभ्रप्रकाशेन हिमराशिनिभेन च |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
पाण्डुराभ्रप्रतीकाशे विमाने हंसलक्षणे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुराभ्रप्रतीकाशैर्मनोवाय़ुसमैर्जवे ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेण च माल्येन पताकाभिश्च वेदिभिः |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण चामरव्यजनेन च |
१० क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि |
९१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि |
३ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुरेणातपत्रेण हेमदण्डेन चारुणा |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुरैरिन्दुसङ्काशैः सर्वशव्दातिगैर्दृढैः ||
७९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
पाण्डुरैश्चामरैश्चापि वीज्यमानो नराधिप |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
पाण्डुर्जित्वा वहून्देशान्युधा विक्रमणेन च |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुर्धनुषि विक्रान्तो नरेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुर्हि राजा द्रुपदस्य राज्ञः; प्रिय़ः सखा चात्मसमो वभूव |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुसागरमाविद्धः प्रविवेश महानदः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुसृञ्जय़पाञ्चालाञ्शरगोचरमानय़त् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुसेनां हतां दृष्ट्वा तव पुत्रेण भारत |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुसेनामभिद्रुत्य योधय़ामास सर्वतः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुसैन्यं तथा सङ्ख्ये हार्दिक्यः समवारय़त् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डुसैन्यमृते भीमं सुमहद्भय़माविशत् ||
५८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुसैन्यस्य मध्याह्ने धर्मराजेन पातितः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डुस्तु पुनरेवैनां पुत्रलोभान्महाय़शाः |
६४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
पाण्डुस्तु राज्यं सम्प्राप्तः कनीय़ानपि सन्नृपः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डूंश्च सर्वान्सङ्क्रुद्धो धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् |
३३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डूनां किल्विषं कृत्वा संस्थातुं नोत्सहामहे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डूनां दर्शितः पन्थाः सैन्धवेन निवारितः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डूनां भगदत्तेन यमराष्ट्रविवर्धनम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डूनां मध्यगो वीरः पाण्डवानपि चापरे ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डूनां मामकैः सार्धमश्रौषं तव जल्पतः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
पाण्डूनां सर्वसैन्येषु पाञ्चालानां तथैव च |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
पाण्डूनां सह पाञ्चालैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डूनां हितकृच्छक्रः कर्णं भिक्षितुमुद्यतः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोः कुन्त्यां च माद्र्यां च पञ्च पुत्रा महारथाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
पाण्डोः पञ्चैव लक्ष्यन्ते तेऽपि मन्दाः सुदुःखिताः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
जनमेजय़ उवाच
पाण्डोः पुत्रा महात्मानः सर्वे दिव्यपराक्रमाः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोः पुत्रान्कुरुश्रेष्ठानास्यतामिति चाव्रवीत् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोः पुत्रान्पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वय़म् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डोः प्रय़च्छ माद्र्याश्च येभ्यो यावच्च वाञ्छितम् ||
२ ख