द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च साधु साध्विति निस्वनः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
काश्यप उवाच
पाण्डवानां कुलकरं राजानममितौजसम् |
३७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां च कारुण्यात्प्राणान्धारय़ भारत ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां च कुन्त्याश्च तत्सर्वं क्रिय़तां धनैः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां च कुन्त्याश्च द्रौपद्याश्च विशां पते |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां च भद्रं ते सृञ्जय़ानां च सर्वशः ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां च ये योधाः कौरवाणां च सर्वशः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां च राजेन्द्र कौरवाणां च सर्वशः ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां च राजेन्द्र तथाभूते महाहवे ||
६५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
पाण्डवानां च राजेन्द्र तदस्य वचनं कुरु ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां च वासांसि द्रौपद्याश्चाप्युपाहर ||
३८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
पाण्डवानां च विजय़ो हृदय़ं दहतीव मे ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां च शूराणां समासाद्य परस्परम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
पाण्डवानां च सर्वेषां कुन्त्या युक्तानि यानि च ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
व्यास उवाच
पाण्डवानां च सर्वेषां प्रथय़िष्यामि मा शुचः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां जय़ं दृष्ट्वा युद्धाय़ च मनो दधे ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां तथा नित्यं विदुरोऽपि सुखावहः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां तथा सप्त महापुरुषपालिताः ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां तु सैन्येषु नास्ति कश्चित्स भारत |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां त्वदीय़ानां विपरीतानि मारिष ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां निवृत्तानां नानावर्णैर्हय़ोत्तमैः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां प्रभग्नानां कर्णेन शितसाय़कैः |
५० क
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां प्रवृत्तिं वा विद्मः कर्मापि वा कृतम् |
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां प्रसादेन भुञ्जीय़ां राज्यमल्पकम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां प्रहृष्टानां क्षणेन समजाय़त ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां प्रहृष्टानां पाञ्चालानां च सर्वशः ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां प्रिय़ं कार्यमिति किं करवाणि वः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां प्रिय़ं कुर्वन्नात्मनश्च नरोत्तम |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां प्रिय़ा भार्या स्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ||
१०७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां प्रिय़ां भार्यां कृष्णस्य महिषी प्रिय़ा ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां प्रिय़ां भार्यां द्रौपदीं धर्मचारिणीम् ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां भवान्नाथो भवन्तं चाश्रिता वय़म् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां मनुष्येन्द्र तस्मिन्महति कानने ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां महत्सैन्यं यं दृष्ट्वोद्यन्तमाहवे |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डवानां महत्सैन्यं यं दृष्ट्वोद्यन्तमाहवे |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां महाराज व्यपकर्षन्महागजान् ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां महाराज शश्वत्प्रीतिरवर्धत ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां यथावृत्तं केशवः सर्वमुक्तवान् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
पाण्डवानां यशस्कामः परं कर्म करिष्यति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां रणे योधाः परलोकं तथापरे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां रणे योधान्पार्षतेन निपातितः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां रणे शूरा ध्वजिनीं समकम्पय़न् ||
५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां रथाश्चापि नदन्तो भैरवस्वनम् |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां वधे रात्रौ वुद्धिस्तेन प्रदर्शिता ||
६८ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
पाण्डवानां वने घोरे हिडिम्वाय़ाश्च दर्शनम् |
८४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डवानां वलं सूत किं नु शेषमभूत्तदा |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां वलौघस्तु शल्यमासाद्य मारिष |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां विनाशाय़ इत्येवं चुक्रुषुर्जनाः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां विनाशाय़ दुर्योधनजय़ाय़ च ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां विनाशाय़ मा ते वुद्धिः कदाचन ||
५९ ग