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वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
पञ्चाग्नय़ः पञ्चपदा च पङ्क्ति; र्यज्ञाः पञ्चैवाप्यथ पञ्चेन्द्रिय़ाणि |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
पञ्चाग्नय़ो मनुष्येण परिचर्याः प्रय़त्नतः |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
पञ्चात्मके पञ्चगुणप्रदर्शी; स सर्वगात्रानुगतोऽन्तरात्मा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भरद्वाज उवाच
पञ्चात्मके पञ्चरतौ पञ्चविज्ञानसंय़ुते |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चाधिकं शतं तच्च निहतं तत्र भारत |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
पञ्चानां तु त्रय़ो धर्म्या द्वावधर्म्यौ युधिष्ठिर |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ६७
दुःषन्त उवाच
पञ्चानां तु त्रय़ो धर्म्या द्वावधर्म्यौ स्मृताविह ||
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चानां द्रौपदेय़ानां धृष्टद्युम्नशिखण्डिनोः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
पञ्चानां पाण्डवेय़ानां येन योद्धुमिहेच्छसि |
५३ क
विराट पर्व
अध्याय ९
सहदेव उवाच
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ११
नकुल उवाच
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २५१
कोटिकाश्य उवाच
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां महिषी संमता भृशम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां यत्तेजः प्रमिमीषसि |
२ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणामविज्ञातो महारिपुः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चानां पुरुषेन्द्राणां चित्तप्रमथिनी रहः ||
९७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
पञ्चानां भूतसङ्घानां सन्ततिं मुनय़ो विदुः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १८८
धृष्टद्युम्न उवाच
पञ्चानां महिषी कृष्णा भवत्विति कथञ्चन ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
पञ्चानां विहिता पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
पञ्चानां सिन्धुषष्ठानां नदीनां येऽन्तराश्रिताः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
पञ्चानामशनं दत्त्वा शेषमश्नन्ति साधवः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चानामिन्द्रकल्पानां प्रेक्षतां मधुसूदन ||
१०८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
पञ्चानामिन्द्रिय़ाणां तु दोषानाक्षिप्य पञ्चधा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
पञ्चानामिन्द्रिय़ाणां तु शोकवेग इवातुलः ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चानामिव भूतानां नाहं वधमचिन्तय़म् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
पञ्चानामिव भूतानां महतां सुमहात्मनाम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पञ्चानामेकपत्नीत्वे विमर्शो द्रुपदस्य च |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भरद्वाज उवाच
पञ्चानामेव भूतत्वं कथं समुपपद्यते ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
पञ्चार्द्रो भोजनं कुर्यात्प्राङ्मुखो मौनमास्थितः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
पञ्चालानां च ये श्रेष्ठा राजपुत्रा महावलाः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चाशतं मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन्क्षितौ |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वासुदेव उवाच
पञ्चाशतं षट्च कुरुप्रवीर; शेषं दिनानां तव जीवितस्य |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
पञ्चाशतं सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
पञ्चाशता पुनश्चाजौ त्रिंशता दशभिश्च ह ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
पञ्चाशता रथमुख्यैः समेतः; कर्णस्त्वरन्मामुपाय़ात्प्रमाथी ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चाशता शितैर्वाणैर्विव्याध परमास्त्रवित् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
पञ्चाशदपि ये शूरा मथ्नन्ति महतीं चमूम् |
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
पञ्चाशद्भिः शितै राजंस्तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
पञ्चाशद्भिर्हय़ैश्चैव षट्शतैश्च पदातिभिः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
पञ्चाशद्वर्षवय़सं प्रगल्भमनसूय़कम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
पञ्चास्यैः पन्नगैश्छिन्नैर्गरुडेनेव मारिष ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पञ्चेन्द्राणामुपाख्यानमत्रैवाद्भुतमुच्यते ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
पञ्चेन्द्रिय़ग्राहवतीं मनःसङ्कल्परोधसम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
पञ्चेन्द्रिय़जलां घोरां लोभकूलां सुदुस्तराम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
पञ्चेन्द्रिय़स्य मर्त्यस्य छिद्रं चेदेकमिन्द्रिय़म् |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
पञ्चेन्द्रिय़ाणि यान्याहुस्तान्यदृश्योऽधितिष्ठति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
पञ्चेन्द्रिय़ेषु भूतेषु सर्वं वसति दैवतम् |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
पञ्चेमानि महाराज महाभूतानि सङ्ग्रहात् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
पञ्चेमान्पाण्डवेय़ांश्च द्रौपद्याः कीर्तिवर्धनान् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चेमे पञ्चभिर्जाताः कुमाराश्चामितौजसः |
६४ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
पञ्चैतानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु नित्यदा ||
५७ ख