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सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वतश्च महाभागो मार्कण्डेय़स्तथा मुनिः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वतस्येव दीर्णस्य विस्फोटमशनेरिव ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
पर्वतस्येव शिखरं प्रणुन्नं मेदिनीतले ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
पर्वतस्येव शिखरं वज्रपातविदारितम् |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
पर्वतस्येव शिखरं वज्रभग्नं महीतले ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
पर्वताग्रादिव महांश्चम्पको वाय़ुपीडितः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
पर्वताग्रेऽप्रमेय़ात्मा रश्मिमानुदय़े यथा ||
२६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
पर्वताग्रैश्च वृक्षैश्च निजघ्नुस्ते महागजान् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
पर्वताद्विषमाद्दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात्सरीसृपात् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
पर्वतानां च शिखराण्याचालय़ति वेगवान् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
पर्वतानां पतिं मेरुं सरितां च महोदधिम् ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४४
व्रह्मो उवाच
पर्वतानां महामेरुः सर्वेषामग्रजः स्मृतः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
पर्वतानां महामेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः |
१५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वतानां यथा मेरुः सुपर्णः पततामिव |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
पर्वतानिव वर्षेण तपान्ते जलदो महान् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वतानूपवन्यानि भूतानि ददृशुश्च ते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
पर्वतान्रम्यसानूंश्च नलिनीश्च सपङ्कजाः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वताभोगवर्ष्माणं भोगैश्चन्द्रार्कमण्डलैः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
पर्वताश्च तथा सर्वे काद्रवेय़ाश्च सान्वय़ाः |
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
पर्वताश्च द्रुमाश्चैव क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुय़ुः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
पर्वताश्च नमस्कृत्य तमेव पृथिवीं गताः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पर्वताश्च विशीर्यन्ते मही चापि विशीर्यते ||
७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
पर्वताश्च व्यशीर्यन्त दिशो नागाश्च मोहिताः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
पर्वताश्च शतघ्न्यश्च प्रासाश्च परिघा गदाः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
पर्वताश्चासकृत्क्षिप्ताः सवनाः सवनौकसः |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
पर्वते वनमध्यस्थो ज्वलन्निव हुताशनः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
पर्वतेन किमर्थं च दत्तः केन ममार च ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
पर्वतेन यथा तोय़ं स्रवमाणेन सर्वतः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
पर्वतेभ्यश्च जागर्ति रसो रसगुणात्तथा ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैव युधिष्ठिर ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वतेष्विव वज्राणां शराणां श्रूय़ते स्वनः ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
पर्वतैरिव विध्वस्तैर्विशिखोन्मथितैर्गजैः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
पर्वतैरुपचीय़द्भिः पतमानैस्तथापरैः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वतैश्च वनान्तैश्च काननैश्चोपशोभिताम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
पर्वतैश्छाद्यमानोऽहं निगृहीतैश्च वाजिभिः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वतो मामुवाचेदं काले वचनमर्थवत् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
पर्वतो वारिधाराभिर्वर्षमाणैरिवाम्वुदैः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
पर्वतोऽथ यय़ौ स्वर्गं नारदोऽथ यय़ौ गृहान् ||
४१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
पर्वतोऽनुमतं वाक्यमुवाच मुनिपुङ्गवः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पर्वानुक्रमणी पूर्वं द्वितीय़ं पर्वसङ्ग्रहः |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
पर्विणीं त्वं समुद्दिष्य सुरामन्नं च कारय़ |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पर्वोक्तं भगवद्गीता पर्व भीष्मवधस्ततः |
५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
परय़ा भरतश्रेष्ठं पूजय़ा समवस्थितौ |
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
परय़ा शुशुभे लक्ष्म्या नक्षत्राणामिवोडुराट् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
परय़ा श्रद्धय़ा युक्तो योगेन परमेण च |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
पलाण्डुः सौभञ्जनकस्तथा गृञ्जनकादय़ः |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
पलाण्डुगण्डूषय़ुतान्खादन्ते चैडकान्वहून् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
पलालकाण्डवर्णास्तु वार्धक्षेमिं तरस्विनम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
पलालधूमवर्णाभाः सैन्धवाः शीघ्रमावहन् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
पलालधूम्रवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् |
१७ क