उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
पराजितास्ते पतय़ो न सन्ति; पतिं चान्यं भामिनि त्वं वृणीष्व ||
३६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
पराजिते ततः शूरे द्रुपदस्य सुते प्रभो |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
पराजितेषु भरतेषु दुर्मनाः; कर्णो भृशं न्यश्वसदश्रु वर्तय़न् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
पराजितैर्हि वस्तव्यं तैश्च द्वादश वत्सरान् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
पराजितो नकुलः किं तवास्ति; कृष्णय़ा त्वं दीव्य वै याज्ञसेन्या ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
कर्ण उवाच
पराजितो नकुलो भीमसेनो; युधिष्ठिरः सहदेवोऽर्जुनश्च |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
पराजितोऽसि द्यूतेन कृष्णा चानाय़िता सभाम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
पराजित्य च संहृष्टः कृतवर्माणमाहवे |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
पराजित्य महेष्वासान्पाण्डवान्राज्यमिच्छति ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
पराजित्य रणे तं तु पाण्डवः पाण्डुपूर्वज |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
पराजित्य रणे वीरो द्रोणपुत्रो ननाद ह |
१३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
पराजित्य रणे शक्रं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
पराजेष्याम्यथोद्युक्तौ देवलोकनमस्कृतौ ||
८६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
पराजय़ं कुरूणां चाप्युपाय़ान्तं तथोत्तरम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
पराजय़ं च प्राप्ताः स्म रणे वन्धनमेव च |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२५७
वैशम्पाय़न उवाच
पराजय़ं च सङ्ग्रामे ससहाय़ः समाप्तवान् ||
७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
पराजय़ं धार्तराष्ट्रे विजय़ं च युधिष्ठिरे |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
पराजय़मथावाप्य परत्र च महद्भय़म् |
६० क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
पराजय़मशोचन्तः कृतचित्ताश्च विक्रमे |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
पराजय़मिवेन्द्रस्य द्विषद्भ्यो भीमकर्मणः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
पराजय़ल्लोकवीरानाक्षेपेण पृथक्पृथक् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
पराजय़श्च मरणान्मन्ये नैव विशिष्यते |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
अर्जुन उवाच
पराजय़िष्ये कौरव्यं कवचेनापि रक्षितम् ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
पराजय़े च हेतुः स इति च प्रतिपालय़े ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
पराजय़ो वा मृत्युर्वा श्रेय़ो मृत्युर्न निर्जय़ः |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
पराञ्जिगीषसे पार्थ प्रमत्तानजितेन्द्रिय़ान् ||
५० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
परानभिमुखं यान्तं रथावास्थाय़ दंशितौ ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
परानभिमुखा यत्तास्तिष्ठध्वं भद्रमस्तु वः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
परानवहसन्तश्च स्तुवन्तश्चाच्युतार्जुनौ ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
परानवाकिरत्पार्थः पर्वतानिव नीरदः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
परान्परेभ्यः स्वान्स्वेभ्यः सर्वान्पालय़ नित्यदा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
परान्विजेतुं तस्मात्ते व्येतु भीर्भरतर्षभ |
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
परान्विजय़तश्चापि धार्तराष्ट्रान्निमज्जतः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
परान्वृणीते स्वान्द्वेष्टि तं गौः शपति भारत ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
परान्स्वांश्चापि मृद्नन्तः परिपेतुर्दिशो दश ||
५३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
परापरज्ञस्तु नरो नाभिमानादुदीरितः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
परापवादं न व्रूय़ान्नाप्रिय़ं च कदाचन |
९८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
परापवादनिरताः परदुःखोदय़ेषु च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
परापवादेषु रतिर्विवादानां च सेवनम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
पराभवं च दैत्येन्द्रास्त्वय़ि क्रुद्धे महाद्युते ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
पराभवस्य तल्लिङ्गमिति प्राहुर्मनीषिणः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
पराभवार्थं दैत्यानां देवैः शौचमिदं कृतम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
युधिष्ठिर उवाच
पराभविष्यतश्चैव त्वं मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
पराभविष्यन्त्यसुरा दैतेय़ा दानवैः सह |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
पराभूता च वः सेना न कश्चिद्योद्धुमिच्छति |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
पराभूताः पाण्डुपुत्रा विपत्तिं परमां गताः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
पराभूतेषु दैत्येषु शक्रे त्रिभुवनेश्वरे |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
परामर्शं द्वितीय़ं च सोढुमुत्सहते नु का ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
परामर्शश्च कन्याय़ा हिडिम्वाय़ाः कृतः पुरा |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
परामर्शो मा भविष्यत्कुरुदारेषु सर्वशः ||
७ ख