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उद्योग पर्व
अध्याय २
वलदेव उवाच
प्रिय़ाभ्युपेतस्य युधिष्ठिरस्य; द्यूते प्रमत्तस्य हृतं च राज्यम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ामनोरथं कर्तुमुद्यतश्चारुलोचनः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ार्थं तव पुत्राणां दिधक्षुः पाण्डुनन्दनान् |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ार्थं तव पुत्राणां राक्षसं समवाकिरत् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
प्रिय़ार्थं धार्तराष्ट्रस्य तेन तप्येऽद्य कर्मणा ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ार्थं पुरुषेन्द्रस्य पितुस्तेऽद्य यशस्विनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ार्थमपि चैतेषां व्राह्मणानां महात्मनाम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ६१
वृहदश्व उवाच
प्रिय़ालतालखर्जूरहरीतकविभीतकैः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ३
नकुल उवाच
प्रिय़ाश्च सततं मेऽश्वाः कुरुराज यथा तव ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ाय़ाः प्रिय़कामः स भीमो भीमपराक्रमः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
प्रिय़े चैवाप्रिय़े चैव दुर्वले वलवत्यपि |
१३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
प्रिय़े नातिभृशं हृष्येदप्रिय़े न च सञ्ज्वरेत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
प्रिय़े नातिभृशं हृष्येदप्रिय़े न च सञ्ज्वरेत् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
प्रिय़े नातिभृशं हृष्येद्युज्येतारोग्यकर्मणि ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
प्रिय़े शुभानि कर्माणि द्वेष्ये पापानि भारत ||
४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
देवा ऊचुः
प्रिय़े हि तव वर्तामो देवराजस्य शासनात् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़े हि तव वर्तेते भ्रातरौ कृष्णपाण्डवौ |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
प्रिय़ेण कुरुते वश्यांश्चिरं यशसि तिष्ठति ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ेण कुरुते वश्यांश्चिरं यशसि तिष्ठति ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ेभ्यः प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मय़ा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ेषु चरमाणं त्वां न चैवाप्रिय़कारिणम् |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ैः समागमं तेषां य इमं शृणुय़ान्नरः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
प्रिय़ैर्विवासो वहुशः संवासश्चाप्रिय़ैः सह |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
प्रिय़ो भवति दानेन प्रिय़वादेन चापरः |
१४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
प्रिय़ो भवति दानेन प्रिय़वादेन चापरः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
प्रिय़ो भवति भूतानां धर्मज्ञो वीतभीर्नृपः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
प्रिय़ो भवति भूतानां न च विभ्रश्यते श्रिय़ः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
प्रिय़ो भवति भूतानामिह चैव परत्र च ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
अर्जुन उवाच
प्रिय़ो वहुमतश्चाहं नर्तको गीतकोविदः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
प्रिय़ो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
प्रिय़ो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय़ः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
धृतराष्ट्र उवाच
प्रिय़ो हि पाण्डवो नित्यं भारद्वाजस्य धीमतः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ो हि फल्गुनो नित्यमाचार्यस्य महात्मनः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
वृषादर्भिरु उवाच
प्रिय़ो हि मे व्राह्मणो याचमानो; दद्यामहं वोऽश्वतरीसहस्रम् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
प्रिय़ोऽत्यर्थं तस्य सुय़ोधनस्य; कच्चित्स पापो निहतस्त्वय़ाद्य ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता |
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
जनमेजय़ उवाच
प्रीणात्यतो भवान्भूय़ो विस्तरेण व्रवीतु मे ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
प्रीणामि च यथाशक्ति तच्च त्वं नाववुध्यसे ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीणामि त्वाहमित्युक्त्वा गङ्गास्रोतस्यमज्जय़त् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
प्रीणितश्चापि भवति महतोऽर्थानवाप्य च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीणय़न्ति मनो मेऽद्य शोको मां नर्दय़त्ययम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीणय़न्तु भवन्तो मां यथेष्टमनिय़न्त्रिताः ||
२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
प्रीतः क्षिप्रमथो वृक्षममृतेनावसिक्तवान् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतः परमहृष्टात्मा यथावच्छृणु पार्थिव ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतः प्रिय़ेण सुहृदा रेमे स सहितस्तदा |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ८३
नारद उवाच
प्रीतः प्रीतेन मनसा तत्रैवान्तरधीय़त ||
९६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
प्रीतः शक्रश्च सत्येन तेन सत्येन खं व्रज ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतः स्वर्गोपमं पुण्यं पाण्डवः सह कृष्णय़ा ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
प्रीतश्च भगवान्देवः कर्मणा तेन तस्य वै |
१५२ क