विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़मेतदुपश्रुत्य शत्रूणां तु पराभवम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
प्रिय़मेव तु सर्वेषां यद्व्रवीम्युत किञ्चन |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
प्रिय़मेव परीप्सन्ते केचिदात्मनि यद्धितम् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
प्रिय़मेव वदेन्नित्यं नाप्रिय़ं किञ्चिदाचरेत् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
प्रिय़मेवाचरन्राज्ञः प्रिय़ो भवति भोगवान् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़या कान्तय़ा कान्तः पतमान इवोरसि |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
प्रिय़या सह संवासं प्राप्य कामविमोहितः |
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़व्रतैश्चातकैश्च तथान्यैर्विविधैः खगैः |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
प्रिय़श्च नः साधुतमश्च कृष्णो; नातिक्रमे वचनं केशवस्य ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
प्रिय़श्च प्रिय़कामश्च गतिज्ञः सर्वकर्मणाम् |
७८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़श्च मान्यश्च हि मे युधिष्ठिरः; सदा कुरूणामधिपो महामतिः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़श्चाभवदत्यर्थं देवगन्धर्वरक्षसाम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रिय़श्चैषामात्मसमश्च कृष्णो; विद्वांश्चैषां कर्मणि नित्ययुक्तः ||
३७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रिय़स्तथा प्रजानां त्वं स्वर्गे सुखमवाप्स्यसि ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
शकुनिरु उवाच
प्रिय़स्ते नकुलो राजन्राजपुत्रो युधिष्ठिर |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
प्रिय़स्ते भीमसेनोऽय़मर्जुनो वः पराय़णम् |
६७ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ा च दर्शनीय़ा च पण्डिता च पतिव्रता |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ा प्रिय़ं चिकीर्षन्ती महिषी चारुहासिनी ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६
विराट उवाच
प्रिय़ा हि धूर्ता मम देविनः सदा; भवांश्च देवोपम राज्यमर्हति ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ा हि पाण्डवा नित्यं मम चापि पितुश्च मे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
प्रिय़ां भार्यां द्रौपदीं पाण्डवानां; यशस्विनीं शीलवृत्तोपपन्नाम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
प्रिय़ांश्च रक्तांश्च हितांश्च भर्तु; स्तान्भोजय़ेथा विविधैरुपाय़ैः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
स्त्र्यु उवाच
प्रिय़ाः स्त्रीणां यथा कामो रतिशीला हि योषितः ||
६४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
प्रिय़ाख्याननिमित्तं वै ददौ वहु धनं तदा ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ाणि चैषां कुर्वन्ति यथाशक्ति हितानि च ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ाणि धर्मय़ुक्तानि सत्यानि च हितानि च ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ाणि लभते नित्यमिह च प्रेत्य चैव ह ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
प्रिय़ाणि लभते लोके प्रिय़दः प्रिय़कृत्तथा |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
प्रिय़ाण्यनुभवञ्शेषे विदित्वाभ्यन्तरं जनम् ||
७४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
प्रिय़ाण्याचरतः प्रह्वान्सदा सम्वन्धिनः सतः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ाण्याचरितव्यानि तत्र का परिदेवना ||
४६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ाण्येव तु कौरव्यो नाप्रिय़ाणि कुरूद्वह |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ातिथिर्धर्मसुतो महात्मा; प्रीतो भविष्यत्यभिवीक्ष्य युष्मान् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राक्षस उवाच
प्रिय़ातिथ्यास्तथा दारास्ते वै स्वर्गजितो नराः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ानसून्रणे त्यक्त्वा योधा जग्मुः परस्परम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ानुवर्तिनो भ्रातॄन्सर्वैः समुदितान्गुणैः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ान्पुत्रान्परित्यज्य पाण्डवानन्वपद्यत ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
प्रिय़ान्पुत्रान्वय़स्यांश्च भ्रातॄन्मातॄः पितॄनपि |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ान्प्राणान्परित्यज्य निपेतुर्धरणीतले ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
प्रिय़ान्प्राणान्परित्यज्य प्रधक्ष्यति रिपूंस्तव ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
नारद उवाच
प्रिय़ान्प्राणान्परित्यज्य प्रिय़ार्थं कौरवस्य वै |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
प्रिय़ान्वा यदि वा द्वेष्यांस्तेषु तच्छ्राद्धमावपेत् ||
४६ ग
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ान्सर्वस्य लोकस्य सुकृतैः कर्मभिः शुभैः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
प्रिय़ाप्रिय़े परित्यज्य प्रशान्तात्मा भविष्यसि ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
प्रिय़ाप्रिय़े परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु |
११० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ाप्रिय़े सुखदुःखे च राज; न्निन्दाप्रशंसे च भजेत एनम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ाप्रिय़े सुखदुःखे च राज; न्नेवं विद्वान्नैव युद्धं कुरुष्व ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
प्रिय़ाभावाच्च पुरुषो नैव प्राप्नोति शोभनम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
प्रिय़ाभ्यामनुरूपाभ्यां करेणुभ्यामिव द्विपः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ाभ्युपगते द्यूते पाण्डवा मधुसूदन |
७ क