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सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं कर्तुमुपस्थातुं वलिकर्म स्वभावजम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
प्रिय़ं कार्यं हि मे तस्य यस्यास्मि वचने स्थितः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं कुर्यामिति गृहे यत्कुर्युरुषिताः सुखम् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
प्रिय़ं कुर्वन्व्राह्मणक्षत्रिय़ाणां; धर्मशीलः पुण्यकृदावसेद्गृहान् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
संवर्त उवाच
प्रिय़ं च ते करिष्यामि सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
प्रिय़ं चिकीर्षता भ्रातुः कर्णस्य च जनार्दन ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ं चिकीर्षन्द्रोणस्य धृष्टद्युम्नमवारय़त् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
प्रिय़ं चिकीर्षमाणं च धर्मराजस्य मामपि ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कर्ण उवाच
प्रिय़ं तव मय़ा कार्यमिति जीवामि पार्थिव ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९१
गङ्गो उवाच
प्रिय़ं तस्य करिष्यामि युष्माकं चैतदीप्शितम् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं तु ते चिकीर्षामि वर्ततां यदि मन्यसे ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं तु मे स्यात्सुमहत्कृतं चक्रगदाधर |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं प्रिय़तरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत्कथञ्चन ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
प्रिय़ं प्रिय़ेभ्यश्चरत राजा हि त्वरते जय़े ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय २
वलदेव उवाच
प्रिय़ं मम स्याद्यदि तत्र कश्चि; द्व्रजेच्छमार्थं कुरुपाण्डवानाम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
प्रिय़ं मे दर्शनं वाढं युवय़ोरच्युतार्जुनौ ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
जनमेजय़ उवाच
प्रिय़ं मे स्यात्कृतार्थश्च स्यामहं कृतनिश्चय़ः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं मे स्यान्महावाहो मुच्येरन्महतो भय़ात् ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
प्रिय़ं वदेद्व्याहृतं तत्तृतीय़ं; धर्म्यं वदेद्व्याहृतं तच्चतुर्थम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३८
शृङ्ग्यु उवाच
प्रिय़ं वाप्यप्रिय़ं वा ते वागुक्ता न मृषा मय़ा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रिय़ं वै सर्वमेतत्ते करिष्यति न संशय़ः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
प्रिय़ं व्रूय़ादकृपणः शूरः स्यादविकत्थनः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ं सखाय़ं चाक्रन्दे सखा दैववलात्कृतः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ं सखाय़ं चाक्रन्दे सखा दैववलात्कृतः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ं सखाय़ं सततं गर्हय़न्वृत्तमात्मनः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं सखाय़ं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं सखाय़ं सुप्रीतो राज्यस्थं पुनराव्रजम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ं सम्वन्धिनं राजञ्शरानवकिरन्वहून् ||
५५ ग
वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं सर्वे चिकीर्षामो राज्ञः किङ्करपाणय़ः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
गौतम उवाच
प्रिय़ं हि तव काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
प्रिय़ं हि हर्षजननं हर्ष उत्सेकवर्धनः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
प्रिय़ः प्रजानां सुहृदानुकम्पी; जितेन्द्रिय़ः साधुजनस्य भर्ता ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
प्रिय़ः प्रजानामपि संस्त्वग्दोषेण प्रदूषितः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
युधिष्ठिर उवाच
प्रिय़ः सर्वस्य लोकस्य सर्वसत्त्वाभिनन्दिता |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़कश्चैव नन्दश्च गोनन्दश्च प्रतापवान् |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़कामो जय़ाकाङ्क्षी कृतवानिदमप्रिय़म् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़कृन्मतमाज्ञाय़ पूर्वं दुर्योधनस्य तत् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
प्रिय़ङ्गुचन्दनाभ्यां च विल्वेन तगरेण च |
८० क
वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
प्रिय़ङ्ग्वाम्रवनोपेता वानीरवनमालिनी |
२ क
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़तीर्थवना मार्गे पद्मिनीः समतिक्रमन् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़दर्शनो दीर्घभुजः कथं कृष्ण युधिष्ठिरः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़दर्शनो महावाहुर्धार्तराष्ट्रो महावलः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
प्रिय़दर्शास्तथा चान्ये दर्शनादेव मानवाः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
प्रिय़देवातिथेय़ाश्च वदान्याः प्रिय़साधवः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़पार्श्वोपविष्टाभिर्व्यावृत्ताभिर्विचेष्टितैः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
प्रिय़भक्तो हि भगवान्परमात्मा द्विजप्रिय़ः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रिय़माख्यामि ते राम दृष्टा सा जानकी मय़ा ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़मिन्द्रस्य देवस्य मनोर्वैवस्वतस्य च ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
प्रिय़मिन्द्रस्य सततं सखाय़ममितौजसम् |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़मुत्पादय़ाद्य त्वं प्रेतस्यापि जनार्दन ||
२१ ख