शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
प्राप्ते काले च यद्दुःखं पततां विषय़ैषिणाम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्ते काले तु सुषुवे कन्यां राजीवलोचनाम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
प्राप्ते काले न मे किञ्चिन्न्याय़तः परिहास्यते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
प्राप्ते काले महावीर्यः कालः संशमय़िष्यति ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
प्राप्ते च प्रहरेत्काले न स संवर्तते पुनः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
प्राप्ते चास्तं दिनकरे न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
प्राप्ते चाह्निककाले स मध्यन्दिनगते रवौ |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
प्राप्ते तु काले प्राप्तव्यं नोत्सृजेय़ुर्नरर्षभाः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
प्राप्ते तु दिवसे तस्मिन्सप्तमे द्विजसत्तम |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्ते प्रजाविसर्गे वै सप्तमे पद्मसम्भवे |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
युधिष्ठिर उवाच
प्राप्ते युद्धे तु यद्युक्तं तत्कर्ताय़मिति प्रभो ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
प्राप्तेऽपक्रमणे राजा तस्थौ गिरिरिवाचलः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तेय़ं देवकन्येति दृष्ट्वा संमेनिरे जनाः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तैश्च निय़मैस्तैस्तैर्विचरन्तः पृथक्पृथक् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
प्राप्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रोऽद्य राजा; लालप्यते सञ्जय़ कस्य हेतोः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
द्वाःस्थ उवाच
प्राप्तो दूतः पाण्डवानां सकाशा; त्प्रशाधि राजन्किमय़ं करोतु ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र मे नास्ति संशय़ः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
प्राप्तो मय़ा तात स मत्प्रसूतः; प्रपत्स्यते वेदविधिप्रवृत्तः ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
प्राप्तो विक्रमकालोऽय़ं तव नान्यस्य कस्यचित् ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तो वीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेऽनघ |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तो व्रह्मानुशापेन योनिं राक्षससेविताम् ||
३८ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तोऽसि भरतश्रेष्ठ दिव्यां गतिमनुत्तमाम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्राप्तोऽस्मि ते विषय़ं धर्मराज; लोकानर्हे यान्स्म तान्मे विधत्स्व ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
प्राप्तोऽस्मि पाण्डवान्गत्वा तद्विजानीत कौरवाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
प्राप्तोऽस्मि भगवन्देव त्वत्सकाशमरिन्दम |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्तोऽस्मि समय़े राजन्नग्नीनादाय़ ते विभो |
२० क
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
प्राप्तोऽस्यमरवद्वीर ज्ञातुमिच्छामि तेऽनघ ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
अर्जुन उवाच
प्राप्तौ तु क उपाय़ः स्यात्तद्व्रवीहि जनार्दन |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
प्राप्तौ स्वशिविरं वीरौ मुदा परमय़ा युतौ |
८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
प्राप्त्या पुष्ट्या लोकसंरक्षणेन; गावस्तुल्याः सूर्यपादैः पृथिव्याम् |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्नुवन्ति चिरं क्लेशं यथा त्वमसितेक्षणे ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
प्राप्नुवन्ति ततः पञ्च न भवन्ति शताय़ुषः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
प्राप्नुवन्ति तथा योगास्तत्पदं वीतकल्मषाः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्नुवन्ति नरा राजन्मा तेऽस्त्वन्या विचारणा ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
प्राप्नुवन्ति नरा विप्र यत्कृत्वा कर्मशोभनम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
प्राप्नुवन्ति नराः श्रेय़ो यथेहान्नप्रदाः प्रभो ||
५६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
प्राप्नुवन्ति महात्मान इति वित्त द्विजर्षभाः ||
१८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
प्राप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
प्राप्नुवन्ति महावुद्धे नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
प्राप्नुवन्ति शुभं मोक्षं सूक्ष्मा इह नभः परम् ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
प्राप्नुवन्तीह भूतानि स्वकृतेनैव कर्मणा ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
प्राप्नुवन्त्युत्तमं स्वर्गं कथं च नरकं नृप ||
२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्नुहि त्वं महावाहो तपसश्च फलं महत् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
शक्र उवाच
प्राप्नुहि त्वं शुभाँल्लोकानह्नाय़ च चिराय़ च ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
प्राप्नुय़ाच्च नरो लोकान्व्रह्मणः सदनेऽक्षय़ान् ||
५३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
प्राप्नुय़ात्पुरुषोऽत्यन्तं गङ्गां प्राप्य यदाप्नुय़ात् ||
६५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
प्राप्नुय़ात्स यशो दीप्तं तत्र यो विघ्नमाचरेत् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
प्राप्नुय़ादिति तस्माच्च ईश्वरे तन्निवेशय़ ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्नुय़ादुपवासेन फलं द्वादशवार्षिकम् |
४५ ख