द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे महामाय़ां कर्णं प्रति महारथम् ||
७३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे महामाय़ां घोररूपां सुदारुणाम् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे महामाय़ां तामसीं परतापनः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे महामाय़ां राक्षसः पाण्डुनन्दनः ||
३१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे महारौद्रः क्षणे तस्मिन्महावलः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे रणे दिव्यं व्राह्ममस्त्रं महातपाः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमत्युग्रं भास्करं कुरुनन्दनः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमैन्द्रं वै प्राजापत्यं च भारत |
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
प्रादुष्करोम्येष महास्त्रमुग्रं; शिवाय़ लोकस्य वधाय़ सौतेः |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुष्कृता यथान्याय़मग्नय़ो वेदपारगैः |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुष्कृताग्निरभवत्स च वृद्धो नराधिपः ||
१७ ग
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
प्रादुष्कृताग्निहोत्रोऽय़ं मुहूर्तो रम्यदारुणः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रादृश्यत महावाहुः सवज्र इव वासवः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
प्रादेशमात्रं पुरुषं प्रत्युद्गम्य विशां पते ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
प्रादेशमात्रं भूमेस्तु यो दद्यादनुपस्कृतम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
प्रादेशमात्रे हृदि निश्रितं य; त्तस्मिन्प्राणानात्मय़ाजी जुहोति |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
प्रादेशेनाधिकाः पुम्भिरन्यैस्ते च प्रमाणतः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवंस्तावका योधाः किमेतदिति चाव्रुवन् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवंस्तावकाः सर्वे नदन्तो भैरवान्रवान् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवंस्तुरगास्ते तु शरवेगप्रवाधिताः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवज्जवनैरश्वै रणं हित्वा महाय़शाः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राद्रवत्तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सुः सुदुःखितः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवत्पाण्डवी सेना वध्यमाना समन्ततः ||
७६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवत्सहसा राजन्नकुलो व्याकुलेन्द्रिय़ः ||
९० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवत्सहसा राजन्पुत्रो दुर्योधनस्तव |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राद्रवद्यत्र पानीय़ं शीघ्रं चैवान्वपद्यत ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवद्व्यथिता सेना त्वदीय़ा भरतर्षभ ||
४५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
प्राद्रवन्त ततो देवा यज्ञाङ्गानि च सर्वशः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्त दिशः केचिन्नदन्तो भैरवान्रवान् ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्राद्रवन्त दिशः सर्वा निराशानि स्वजीविते ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्त दिशो राजन्विमृद्नन्तः स्वकं वलम् ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राद्रवन्त भय़ान्मत्स्यास्त्रिगर्तैरर्दिता भृशम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्त महाराज भय़ाविष्टाः समन्ततः ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्त यथाशक्ति कान्दिशीका विचेतसः ||
९५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्त रणं हित्वा क्रोशमाने युधिष्ठिरे ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्त रणे भीता गिरिगह्वरवासिनः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राद्रवन्त रणे भीता यत्र राजा युधिष्ठिरः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्त रणे भीताः कर्णं दृष्ट्वा महावलम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्त हतं दृष्ट्वा श्रुताय़ुधमरिन्दमम् ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्द्विरदाः सर्वे नदन्तो भैरवान्रवान् ||
७६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
प्राद्रवन्नगरं हित्वा भृगोराश्रममप्युत ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राद्रवन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती |
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्रणमुत्सृज्य शिनिवीर्यसमीरितैः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्रथिनां श्रेष्ठा दृष्ट्वा पाण्डुसुतान्रणे ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्सरथाः सर्वे भीमसेनभय़ार्दिताः ||
१०१ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
प्राद्रवन्सहसा भीताः शकुनेश्च पदानुगाः ||
१८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
प्राद्रवाम रणे स्थातुं न हि शक्यामहे त्रय़ः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
प्राद्विषन्कृतसङ्घाताः पूर्वभृत्या मुहुर्मुहुः ||
४० ख
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राद्विषन्व्राह्मणांश्चापि पितॄन्देवांस्तथैव च ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राधमद्वलमास्थाय़ द्विषतां लोमहर्षणम् ||
७ ख