आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टमनसं तत्र विहरन्तं यथामरम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
प्रहृष्टमनसः प्रीत्या प्रशशंसुर्वृकोदरम् ||
७१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टमनसः शूराः क्षिप्रं जग्मुः परस्परम् ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टमनसः शूराः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टमनसः सर्वे किञ्चिदुत्फुल्ललोचनाः |
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
प्रहृष्टमनसः सर्वे नलाय़ाष्टौ वरान्ददुः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टमनसः सर्वे वभूवुस्तत्र पाण्डवाः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टमनसस्तत्र कृष्णेन सह पाण्डवाः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टमनसो जग्मुर्यथास्वं पुनराश्रमान् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टमनसो भूत्वा सिंहवद्व्यनदन्मुहुः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टमप्रहृष्टं च सन्दधाम तथा परैः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
प्रहृष्टरूपाश्च जय़ाय़ देवा; स्त्वष्टारमागम्य तमर्थमूचुः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टलोमकूपाः स्म संविग्नरथकुञ्जराः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टवदनाः सर्वे समुत्तस्थुर्नरर्षभाः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टवित्रस्तविषण्णविस्मृता; स्तथापरे शोकगता इवाभवन् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
प्रहृष्टविहगश्चैव प्रपुष्पितवनद्रुमः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टस्तावकाञ्जित्वा सूतं याहीत्यचोदय़त् ||
४६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टा गतसन्तापा सभापालानुवाच ह ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टा दंशिता योधाः परानीकविदारणाः |
५२ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टाः केशवं जग्मुः संस्तुवन्तो महर्षय़ः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टाः पाण्डवा भूत्वा निन्यिरे यमसादनम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टाः पाण्डवा राजन्सहिताः शार्ङ्गधन्वना ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
जनमेजय़ उवाच
प्रहृष्टानि च रोमाणि प्रसन्नं च मनो मम ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टास्तावका राजन्सिंहनादान्विनेदिरे ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
प्रहृष्टैः पार्षदैर्जुष्टं नृत्यद्भिर्विविधाननैः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहृष्टो धृतराष्ट्रोऽभूद्विदुरश्च महाय़शाः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
प्रहृष्टो भव विप्रर्षे समागच्छ मय़ा सह |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विरोचन उवाच
प्रह्राद तत्त्वां पृच्छामि मा प्रश्नमनृतं वदीः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
सुधन्वो उवाच
प्रह्राद त्वं तु नौ प्रश्नं तथ्यं प्रव्रूहि पृच्छतोः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
प्रह्राद स्वस्थरूपोऽसि पश्यन्व्यसनमात्मनः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
प्रह्रादं च निहत्याजौ ततो देवाधिपोऽभवम् ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
प्रह्रादं समरे जित्वा यथा शक्रं मरुद्गणाः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रह्रादः पूर्वजस्तेषां संह्रादस्तदनन्तरम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रह्रादशिष्यो नग्नजित्सुवलश्चाभवत्ततः |
९३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रह्रादस्त्वव्रवीत्प्रीतो गृह्यतां वर इत्युत ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रह्रादस्त्वव्रवीद्विप्रं क्षणो नास्ति द्विजर्षभ |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
प्रह्रादस्य च संवादं मुनेराजगरस्य च ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
प्रह्रादस्य च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रह्रादस्य त्रय़ः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रह्रादस्य महाराज निश्चय़ं न च जग्मिवान् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रह्रादेन हृतं राज्यं महेन्द्रस्य महात्मनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
प्रह्रादो नमुचिर्दक्षो विप्रचित्तिर्विरोचनः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
प्रह्रादो नमुचिर्मङ्किस्तस्याः किं विद्यते परम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रह्रादो नाम वाह्लीकः स वभूव नराधिपः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४४
व्राह्मण उवाच
प्रह्रादय़ति मां वाक्यं भवता यदुदीरितम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलय़तामहम् |
३० क
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराङ्गिरसस्य च ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
द्रौपद्यु उवाच
प्रह्लादस्य च संवादं वलेर्वैरोचनस्य च ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
प्रह्लादो नाम दैत्येन्द्रस्तस्य पुत्रो विरोचनः |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
प्रह्लादो मूषिकादश्च तथैव जनमेजय़ः |
१० क