आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
प्रसादितो मय़ा पूर्वं तवार्थाय़ पितामहः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादे चापि पद्मा श्रीर्नित्यं त्वय़ि महामते ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजाय़ते |
६५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
प्रसादेनैव सत्त्वस्य प्रसादं समवाप्नुय़ात् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
प्रसाद्य कश्यपं देवी क्षत्रिय़ान्वाहुशालिनः ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्रह्मो उवाच
प्रसाद्य तानुभौ लोकाववाप्स्यथ यथा पुरा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
स्थाणुरु उवाच
प्रसाद्य त्वां महादेव याचाम्यावृत्तिजाः प्रजाः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
प्रसाद्य देवान्सविभून्समस्ता; न्भगीरथस्तपसोग्रेण गङ्गाम् |
९५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्रसाद्य धर्मराजानं प्रहृष्टेनान्तरात्मना |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसाद्य धर्मार्थविदश्च वाच्या; यथार्थसिद्धिः परमा भवेन्नः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्रसाद्य भक्त्या राजानं प्रीतं चैव युधिष्ठिरम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
प्रसाद्य यत्नेन तमुग्रतेजसं; सनातनं व्रह्म यथाद्य वै त्वय़ा ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
प्रसाद्य राजानममित्रसाहं; स्थितोऽव्रवीच्चैनमभिप्रपन्नः |
९९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
प्रसाद्य व्राह्मणं ते तु पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च |
५२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसाद्य शिरसा विद्वानुलूपी पृच्छ्यतामिति ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
प्रसाद्य शिरसा सर्वे रुद्रमूचुर्भृगूद्वह ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसाद्य सर्वे वक्तव्याः पाण्डुः प्रव्रजितो वनम् ||
२४ ग
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
प्रसाद्य सोदरान्सर्वानाज्ञापय़त मोक्षणे ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७५
शुक्र उवाच
प्रसाद्यतां देवय़ानी जीवितं ह्यत्र मे स्थितम् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसाद्यार्थमवाप्स्यामो नूनं वाग्वुद्धिकर्मभिः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
पराशर उवाच
प्रसाद्याहं पुरा शर्वं मनसाचिन्तय़ं नृप |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्रसादय़ कुरुश्रेष्ठमेतदत्र मतं मम ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
प्रसादय़ति धर्मेण प्रसाद्य च विराजते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४३
अतिथिरु उवाच
प्रसादय़ति भूतानि त्रिविधे वर्त्मनि स्थितः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
प्रसादय़ति लोकं यः तं लोकोऽनुप्रसीदति ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
प्रसादय़न्तस्तं भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ||
१४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़न्तस्तमृषिं वसवः पार्थिवर्षभ |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
प्रसादय़न्ति चेन्द्राणी नहुषाय़ प्रदीय़ताम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
प्रसादय़न्त्यां भार्याय़ां मय़ि व्रह्मविदां वर |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
प्रसादय़न्महादेवममर्षवशमास्थितः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
प्रसादय़ां वभूवाथ ततो भूमिं विशां पते ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
निषादा ऊचुः
प्रसादय़ामहे विद्वन्भवन्तं प्रणता वय़म् |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़ामास च तं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़ामास च तमगस्त्यं त्रिदशेश्वरः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
प्रसादय़ामास ततो देवं नाराय़णं प्रभुम् |
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
प्रसादय़ामास तदा नैतदेवं भवेदिति ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़ामास तदा शूलस्थमृषिसत्तमम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रसादय़ामास पुनः क्षिप्रमेवं भवेदिति ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
प्रसादय़ामास भवं तदा ह्यस्त्रोपलव्धय़े ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
प्रसादय़ामास भृगुं शापान्तो मे भवेदिति ||
२५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
प्रसादय़ामास मनस्तेन रुद्रस्य भारत ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़ामास मुनिं नैतदेवं भवेदिति ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
प्रसादय़ामास मुनिं सदस्यास्ते च सर्वशः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
प्रसादय़ामास स तान्कश्यपः पुत्रकारणात् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़ामास हरं पार्थः परपुरञ्जय़ः ||
५६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
विराट उवाच
प्रसादय़ामो भद्रं ते सानुजं पाण्डवर्षभम् ||
१९ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़ाव नृपते भवान्प्रभुरिहास्ति यत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
प्रसादय़ाशु लोकानां शान्तिर्भवतु माचिरम् ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादय़ितुमासाद्य दर्शय़न्ती यथातथम् ||
१८ ख