शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वासुदेव उवाच
प्रव्रूहि धर्मार्थसमाधिय़ुक्त; मर्थ्यं वचोऽस्यापनुदास्य शोकम् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
प्रव्रूहि पार्थ स्वगुणानिहात्मन; स्तथा स्वहार्दं भवतीह सद्यः ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्रूहि भरतश्रेष्ठ त्वं हि वुद्धिमतां वरः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
युधिष्ठिर उवाच
प्रव्रूहि भरतश्रेष्ठ यदत्र व्यतिरिच्यते ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
प्रव्रूहि भृगुशार्दूल किं भूय़ः कथ्यतामिति ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्रूहि राजशार्दूल कर्ता ह्यस्मि तथा नृप |
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
प्रव्रूहि वा किं क्रिय़तां द्विजेन्द्र; शुश्रूषुरस्म्यद्य वचस्त्वदीय़म् ||
१८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
जनमेजय़ उवाच
प्रव्रूहि वै मय़ा पृष्टः प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
प्रव्रूहि सत्यं पुनरुत्तरं विधे; र्वचः प्रवक्ष्याम्यहमर्थसिद्धय़े ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
प्रव्रूय़ाद्व्रह्मणो धर्मं त्यजेत्तं देशमात्मवान् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्रूय़ान्मद्विधः कश्चिद्गुरौ शिष्य इव स्थिते ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
उत्तर उवाच
प्रव्रूय़ास्तानि यदि मे श्रद्दध्यां सर्वमेव ते ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
प्रशंसन्ति नमस्कारैर्युक्तमात्मगुणावहम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
दुर्योधन उवाच
प्रशंसस्यभिनन्दंस्तान्पार्थानक्षपराजितान् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
प्रशंसा ह्येव मांसस्य दोषकर्मफलान्विता ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशंसावचनैस्तासां मिथःशव्दैश्च भारत |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रशमाद्धि भवेच्छान्तिर्मदन्तं युद्धमस्तु च |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
प्रशमे पाण्डवैः सार्धं सोऽन्यस्य शृणुय़ात्कथम् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
प्रशमे हि कृतो यत्नः सुचिरात्सुचिरं मय़ा |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशशंस ततो मत्स्यः शृण्वतः सव्यसाचिनः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
प्रशशंस नरव्याघ्रावुभौ माधवपाण्डवौ ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्राह्मणा ऊचुः
प्रशशंसुर्द्विजांश्चैव व्रह्माणं च यशस्विनम् ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
प्रशशंसुश्च सुप्रीता नलं ता विस्मय़ान्विताः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
प्रशशाम ततो वाय़ुः प्रसन्नाश्चाभवन्दिशः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
प्रशशाम रजो भौमं व्युक्षितं रणशोणितैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
प्रशशाम रजो भौमं शीघ्रत्वादनिलस्य च ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
प्रशशास महाराज यथैवास्य पितामहः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
प्रशस्तं जापकत्वं च दोषाश्चैते तदात्मकाः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रं हि व्रह्मसंस्थितम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
प्रशस्तांश्चतुरः पूर्वान्व्राह्मणस्योपधारय़ |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छव्दः पार्थ युज्यते ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
प्रशस्तेऽहनि यज्ञीय़े सर्वकामसमृद्धिमत् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशस्य विप्रेक्ष्य च धर्मराजः; कृताञ्जलिः केशवमित्युवाच ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
प्रशस्यमानश्च तथा नाहृष्यद्यूपकेतनः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
विराट उवाच
प्रशस्यमाने यः शूरे त्वय़ि षण्ढं प्रशंसति ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
प्रशस्यमानौ समरे सिद्धचारणवातिकैः |
७२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
प्रशस्यैनं विवेशाथ स्वमेव भवनं तदा ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
प्रशातितोपकरणान्हतय़ोधान्सहस्रशः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
प्रशाधि तं महावाहो यत्कृतेऽहं सुदुःखिता ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशाधि त्वमिमामुर्वीं क्षेमां निहतकण्टकाम् |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां ततस्तं भ्रातृभिः सह |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां हतामित्रां नरोत्तम ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशाधि पृथिवीं देवीं प्रजा धर्मेण पालय़न् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशाधि पृथिवीं पार्थ यय़ातिरिव नाहुषः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
प्रशाधि पृथिवीं राजन्प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशाधि पृथिवीं राजन्यत्र तेऽनुग्रहो भवेत् |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
प्रशाधि पृथिवीं वीर मद्दत्तामखिलामिमाम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रशाधि पृथिवीं स्फीतां कर्णसौवलपालिताम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
प्रशाधि राज्यं कौन्तेय़ कुन्तीं च प्रतिनन्दय़ ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि; इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ||
८० ख