chevron_left  प्रवेक्ष्यसीतिarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
प्रवेक्ष्यसीति तं शक्रः पुनरेवाभ्यभाषत |
१० क
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
प्रवेक्ष्यामो महावाहो पर्वतं गन्धमादनम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
प्रवेक्ष्यामो मिताहारा धनञ्जय़दिदृक्षवः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
प्रवेण्युत्तरपार्श्वे तु पुण्ये कण्वाश्रमे तथा |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवेपत भय़ोद्विग्नं सिंहं दृष्ट्वेव गोगणः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रवेपते मे हृदय़ं भय़ेन; श्रुत्वा कृष्णावेकरथे समेतौ ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
प्रवेरितं विय़ति मुहुः क्षितौ तदा; पपौ रणे रुधिरमथो पिशाचवत् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवेशं कारय़ामास गते संवत्सरे तदा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २३६
जनमेजय़ उवाच
प्रवेशं विस्तरेण त्वं वैशम्पाय़न कीर्तय़ ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रवेशः केन दत्तोऽय़मनय़ोर्वैन्यसंसदि |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवेशः क्रिय़ते राजन्यथा तेन प्रवर्तितः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवेशने तु पार्थानां जनस्य पुरवासिनः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
प्रवेशस्ते कृतः केन मम राष्ट्रे पुरे तथा |
५८ क
वन पर्व
अध्याय २३६
जनमेजय़ उवाच
प्रवेशो हास्तिनपुरे दुष्करः प्रतिभाति मे ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवेश्यतामुभौ तूर्णं दर्शनेप्सुरहं तय़ोः ||
५१ ख
विराट पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवेश्यतामेष समीपमाशु मे; विभाति वीरो हि यथामरस्तथा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
धृतराष्ट्र उवाच
प्रवेशय़ महाप्राज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवेशय़ामासुरथो पुरन्दरनिवेशनम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
प्रवेशय़ेच्च तान्सर्वाञ्शाखानगरकेष्वपि ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
प्रवेष्टुकामास्तेनैव येन स प्राविशच्चमूम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
प्रवोधनकरं ज्ञानं साङ्ख्यानामवनीपते |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवोधनभय़ाद्राजन्भीमस्य प्रत्यषेधय़त् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
प्रवोधनार्थं श्रुतिधर्मय़ुक्तं; वृद्धानुपास्यं च भवेत यस्य |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवोधितोऽस्मि भवता धातुमानिव पर्वतः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रवोध्य महता चैनं यत्नेनागतसाध्वसः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवोध्यते मागधसूतपूगै; र्नित्यं स्तुवद्भिः स्वय़मिन्द्रकल्पः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवोध्यमानो वुवुधे स्तुतिभिर्मङ्गलैस्तथा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवोधय़ैनान्संसुप्तान्मातरं च परन्तप |
६ क
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्याहरत्तं प्रविमृश्य राजा; प्रोवाच भीमं च धनञ्जय़ं च ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
प्रव्याहरन्ति क्रव्यादा गृध्रगोमाय़ुवाय़साः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ५३
वृहदश्व उवाच
प्रव्याहरन्ती शनकैर्नलं राजानमव्रवीत् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्याहारय़ दुर्धर्ष त्वमग्रे मधुसूदन |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्रजन्तोऽन्वधावत्सा कृपणा पुत्रगृद्धिनी |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
प्रव्रजेच्च परं स्थानं परिव्रज्यामनुत्तमाम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
प्रव्रज्या हि सुदुःखेय़ं सुकुमार्या विशेषतः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रव्रज्याय़ां हि मे हेतुः स एव पुरुषर्षभः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
प्रव्रज्याय़ैव दीव्येत विना दुर्द्यूतदेविनम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्राजनं च नगरादजिनैश्च निवासनम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
प्रव्राजनं च नगरादजिनैश्च विवासनम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्राजनं च पुत्राणां न मे तद्दुःखकारणम् ||
८४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
प्रव्राजनं सुतानां वा न मे तद्दुःखकारणम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
प्रव्राजिता वनं सर्वे पाण्डवाः सह कृष्णय़ा |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
प्रव्राजितुमिहेच्छामि तपस्तप्स्यामि दुश्चरम् ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्राज्य पाण्डवान्राज्याद्राजन्किमनुशोचसि ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ४७
जनमेजय़ उवाच
प्रव्राज्य पाण्डवान्वीरान्सर्वमेतन्निरर्थकम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्राज्य पाण्डवान्वीरान्स्वेन वीर्येण भारत |
२ क
वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्राज्य पार्थान्सुखमाप्नुवन्ति; धिक्पापवुद्धीन्भरतप्रधानान् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
प्रव्राजय़ेय़ं कालकेय़ान्पृथिव्या; मपाकर्षं दानवानन्तरिक्षात् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
सावित्र्यु उवाच
प्रव्रूहि जपतां श्रेष्ठ सर्वं तत्ते भविष्यति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
शक्र उवाच
प्रव्रूहि तमुपाय़ं मे सम्यक्प्रह्राद पृच्छते ||
३३ ख