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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य च रणे द्रोणः पाञ्चालानां वरूथिनीम् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्य च श्वेव स सिंहगोष्ठं; समासदन्महिषीं पाण्डवानाम् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्य च स तद्वेश्म तमसा संवृतं महत् ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य च स तां सेनां शल्यः परवलार्दनः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ९९
लोमश उवाच
प्रविश्य चैवोदधिमप्रमेय़ं; झषाकुलं रत्नसमाकुलं च ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य तद्वनं घोरं वीक्षमाणाः समन्ततः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य तद्वलं कृष्णस्तुरगैर्वातवेगिभिः |
६१ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
प्रविश्य तद्वेश्म महारथाना; मित्यव्रवीद्द्रौपदीं राजपुत्रीम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
प्रविश्य तां पुरीं रम्यां देवगन्धर्वसेविताम् |
५१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्य तां सभां रम्यां विजह्राते च भारत ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
प्रविश्य तु महारण्यं तापसानामथाश्रमम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य तु रणे भीमो मकरं मुखतस्तदा |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य तु रणे राजन्केशवः परवीरहा |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्य तोय़ं निर्मुक्ता जग्मुर्भर्तृसलोकताम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य त्वार्जुनिः सेनां सत्यसन्धो दुरासदाम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
प्रविश्य नगरं चाहं सत्यवत्यै न्यवेदय़म् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
प्रविश्य नगरं चैव ज्ञातिसम्वन्धिभिर्वृतः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
प्रविश्य नगरं मात्रे सत्यवत्यै न्यवेदय़म् |
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्य नगरं वीरो रथघोषेण नादय़न् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य पाण्डवानीकं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य प्रत्यपद्यन्त कोशरत्नर्द्धिसञ्चय़ान् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
प्रविश्य फेनं तं विष्णुरथ वृत्रं व्यनाशय़त् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्य भवनं राजा देवराजगृहोपमम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य भीमेन निवर्हितोऽस्मि; घोरैः शरैर्मृत्युदण्डप्रकाशैः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रविश्य मकरावासं यादोभिरभिसंवृतम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
प्रविश्य महतीं सेनां योधय़ामास मे सुतः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
प्रविश्य मानुषं देहं मर्यादावन्धकारणात् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
प्रविश्य यज्ञाय़तनं विवादे; वन्दिं निजग्राहतुरप्रमेय़म् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
प्रविश्य वज्रो वृत्रं तु दारय़ामास भारत |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
धृतराष्ट्र उवाच
प्रविश्य विचरन्तं च रणे शूरमवस्थितम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्य विषमं घोरं पर्वतं गन्धमादनम् ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य शिविरं रात्रौ पशुमारेण मारितः ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रविश्य स पुरीं रम्यां विमानैर्वहुभिर्वृताम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रविश्य स महेष्वासः पाञ्चालानरिमर्दनः |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
प्रविश्य समरे वीरः पाण्डवानामनीकिनीम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ६३
कर्ण उवाच
प्रविश्य सा नः परिचारैर्भजस्व; तत्ते कार्यं शिष्टमावेश्य वेश्म |
२ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
प्रविश्य सान्त्वय़ामास पौरांश्च निषधाधिपः ||
२९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्याथ गृहं तस्याश्चरणावभिवाद्य च |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
प्रविश्यान्तःपुरं क्षत्रिय़ा याच्यतामिति ||
१०९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्यान्तःपुरं तत्र देवय़ानीं न्यवेशय़त् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १२७
लोमश उवाच
प्रविश्यान्तःपुरं पुत्रमाश्वासय़दरिन्दमः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
प्रविश्यान्तरमन्येषामग्रसत्प्रतिपत्तिमान् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्यान्तर्दधे राजन्सागरं कुनदी यथा ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
प्रविश्यापस्ततो वह्निः ससमुद्राः सपल्वलाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्याभ्यन्तरं श्रीमान्दैवतान्यभिगम्य च |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्यैतद्रथानीकमप्रधृष्यं दुरासदम् |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
प्रविश्यैव तु राजेन्द्र क्षत्रिय़ेन्द्रान्तकोपमः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
प्रविष्टः स निशां तां च गमय़ामास पार्थिवः ||
२० ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रविष्टः स स्वमात्मानं भ्राता ते वुद्धिसत्तमः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
प्रविष्टः स हि दुर्धर्षः शक्रस्यापि विशेद्वलम् ||
८३ ख