उद्योग पर्व
अध्याय
४१
विदुर उवाच
प्रवक्ष्यति महाराज सर्ववुद्धिमतां वरः ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवक्ष्यन्ति हितं तात सर्वं कौरवनन्दन ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
प्रवक्ष्यामि तु ते भूय़स्तन्निवोध यथाश्रुतम् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
प्रवक्ष्यामि तु ते सर्वांस्तिथ्यां तिथ्यां गुणागुणान् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
युधिष्ठिर उवाच
प्रवक्ष्यामि तु सन्देहं तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवक्ष्याम्यपरं भूय़ो वरमत्र यथाविधि ||
५० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
प्रवक्ष्येऽहं महाप्राज्ञ पदमुत्तममद्य ते |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
प्रवणा नव चैवासञ्शाल्वस्य शिविरे नृप ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवणोऽस्मि वरं दातुं पश्य मे तपसो वलम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
दुर्योधन उवाच
प्रवदन्नर्जुने सख्यं नाहं गच्छेऽद्य केशवम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
प्रवपन्निव वीजानि वीजकाले नरर्षभ |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
प्रवपन्निशितान्वाणान्महेन्द्राशनिसंनिभान् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवभौ ज्वलमानेव दिव्या दिव्येन वर्चसा ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
प्रवभौ पुरुषव्याघ्रो मन्दरस्थ इवांशुमान् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
प्रवभौ वसुधा घोरा तत्र तत्र विशां पते ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
प्रवभौ स रथो मुक्तस्तावकानां भय़ङ्करः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रवभौ हरिसैन्यं तच्छालतालशिलाय़ुधम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
प्रवरं प्रथमं स्वर्ग्यं सर्वभूतहितं शुभम् |
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
प्रवरं वृष्णिवीराणां यन्न हन्याद्धि सात्यकिम् |
५९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
मन उवाच
प्रवरं सर्वभूतानामहमस्मि सनातनम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवरा रक्षसेन्द्राणां यक्षाणां च धनाधिप |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
प्रवराणीव शैलानां शिखराणि द्विपोत्तमाः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
प्रवरानात्मजानां ते सुतांश्चान्यान्महारथान् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रवराम्वरसंवीतं श्रिय़ा जुष्टमलङ्कृतम् ||
४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
प्रवरौ सर्वभूतानां सर्वशङ्खवरौ भुवि |
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
प्रवर्तता वलौघेन महता भारपीडिता ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवर्ततां महाय़ज्ञस्तवापि भरतर्षभ ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवर्ततां यथान्याय़ं सर्वतो ह्यनिवारितः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रवर्ततां सुहृद्द्यूतं दिष्टमेतन्न संशय़ः ||
५४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
प्रवर्तनं शुभानां च तत्सतां वृत्तमुच्यते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
प्रवर्तनाद्द्वापरस्य यथाभागमुपाश्नुते |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
प्रवर्तनाद्द्वापरस्य यथाभागमुपाश्नुते ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवर्तन्तां क्रिय़ाः सर्वाः सर्वलोकेषु माचिरम् ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं व्रह्मवादिनाम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
प्रवर्तमानं तु रजः सत्त्वमप्यनुवर्तते ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
प्रवर्तमानं हि रजस्तद्भावमनुवर्तते ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
प्रवर्तमाने तु पुनर्महाहवे; विगाह्यमानासु चमूषु पार्थिवैः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रवर्तमाने द्यूते तु मत्स्यः पाण्डवमव्रवीत् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
प्रवर्तमाने सङ्ग्रामे तस्मिन्नतिभय़ङ्करे |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
प्रवर्तमानैरनय़े दुर्धरैरकृतात्मभिः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
प्रवर्तितामर्जुनवाणसङ्घै; र्मेदोवसासृक्प्रवहां सुभीमाम् ||
१२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्रवर्तितोग्ररुधिरां शतशः क्षत्रिय़र्षभैः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
प्रवर्तिष्यामहे राजन्यथाश्रद्धं निवर्हणे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
प्रवर्धते तस्य राष्ट्रं नृपस्य; भुङ्क्ते महीं चाप्यखिलां चिराय़ ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
प्रवर्षणे सुरेन्द्रस्य समर्थान्पृथिवीपतिः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
प्रवर्षतः शरव्रातानर्जुनस्य शितान्वहून् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
प्रववर्ष च तत्रैव सहसा तोय़मुल्वणम् |
१८ क