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आदि पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
प्रभुरमितवलो रणेऽभिमन्यु; र्नृपवरमध्यगतो भृशं व्यराजत् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
प्रभुर्निय़मने राजा य एतान्न निय़च्छति |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
देवा ऊचुः
प्रभुर्भवसि तस्मात्त्वं समनुज्ञातुमर्हसि ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पाय़नमेव च |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
प्रभुर्वहति शुद्धात्मा परमात्मानमात्मना ||
७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
प्रभुर्ह्यन्नमदन्विद्वान्पुनर्जनय़तीश्वरः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
प्रभुश्च क्षमय़ा युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान् ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभूतजलकाष्ठानि दुराधर्षतराणि च |
७६ क
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
प्रभूतधनधान्याढ्यमृत्विग्भिः सुनिवेशितम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
प्रभूतनरनागाश्वं महारथसमाकुलम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
प्रभूतनरनागेन वलेनोपविवेश ह ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभूतनागाश्वरथं महाधनं; समृद्धिय़ुक्तं वहुपानभोजनम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
प्रभूतपद्मोत्पलमत्स्यकच्छपौ; महाह्रदौ पक्षिगणानुनादितौ |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभूतभक्ष्यपेय़ास्ते सदारा यादवास्तदा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
प्रभूतमत्स्ये कौन्तेय़ वभूवुः सहचारिणः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रभूतमधुमांसेषु वारिमत्सु शिवेषु च ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रभूतरक्षोगणभूतसेविता; शिरःकपालाकुलकेशशाद्वला |
१२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
प्रभूतस्त्रिककुव्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभूतहस्त्यश्वरथां पदातिगणसङ्कुलाम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रभूतान्नोदके तस्मिन्वहुमूलफले वने |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
प्रभ्रंशितः सुरसिद्धर्षिलोका; त्परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
प्रमतिः सह पुत्रेण तथान्ये वनवासिनः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
प्रमतिश्चाभ्ययाच्छ्रुत्वा स्थूलकेशं यशस्विनम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
प्रमतिस्तु रुरुं नाम घृताच्यां समजीजनत् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
प्रमतेरप्यभूत्पुत्रो घृताच्यां रुरुरित्युत ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रमत्तं ग्राम्यधर्मेषु कृतघ्नं स्वार्थपण्डितम् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमत्तमत्तसंमत्तक्ष्वेडितोत्कृष्टसङ्कुला |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
प्रमत्तमनसो रामः प्राहिणोन्मृत्युसंमितान् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
पाण्डुरु उवाच
प्रमत्तमप्रमत्तं वा विवृतं घ्नन्ति चौजसा |
१७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमत्तमर्था हि नरं समन्ता; त्त्यजन्त्यनर्थाश्च समाविशन्ति ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
प्रमत्तश्च हतो वीरस्तं हनिष्ये जनार्दनम् ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
प्रमत्तस्य यदच्छैत्सीद्वाहुं शूरस्य यज्वनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमत्तस्यैवमेवान्यः शिरस्ते पातय़िष्यति ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमत्ता निशि विश्वस्ताः स्वपन्तः शिविरे स्वके ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
प्रमत्तानां हरन्त्वाशु विघ्न एवं भविष्यति ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमत्तामुपय़ान्त्यन्ये स्वय़मन्ये च विन्दते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
शम्वर उवाच
प्रमत्तेष्वप्रमत्तोऽस्मि सदा सुप्तेषु जागृमि ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
प्रमत्तेष्वभिघातं हि कुर्याच्छाल्वो नराधिपः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमत्तो ग्राम्यधर्मेषु मन्दात्मा पापनिश्चय़ः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रो दुर्योधनस्तदा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २९४
इन्द्र उवाच
प्रमत्तो मोक्ष्यसे चापि त्वय़्येवैषा पतिष्यति ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
प्रमत्तो वाभवद्द्रोणस्ततो मृत्युमुपेय़िवान् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
प्रमथानां गणैश्चैव समन्तात्परिवारितम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
प्रमथिष्यन्निव शिरो भीमसेनस्य संय़ुगे ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
प्रमथ्नन्तं तदा वीरं भारद्वाजं महारथम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
प्रमथ्य च विषाणाग्रैः समुत्क्षिप्य च वारणैः |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमथ्य चाच्छिनद्गावः किमय़ं प्रोषितस्तदा ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
प्रमथ्य चाश्रमात्तस्माद्धोमधेन्वास्तदा वलात् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रमथ्य जित्वा च प्रसह्य मत्स्यं; विराटमोजस्विनमभ्यधावत् ||
७ ख