आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभावज्ञास्मि ते कृष्ण तस्मादेतद्व्रवीमि ते |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभावज्ञास्मि ते कृष्ण सत्यस्याभिजनस्य च ||
१०१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभावती विशालाक्षी पलिता गोनसी तथा |
३ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
प्रभाववानपि नरस्तस्य लोकाः सनातनाः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
प्रभावा वहवश्चापि श्रूय़न्ते व्रह्मवादिनाम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
प्रभावांश्चैव वेत्थ त्वं सर्वेषामेव पार्थिव ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभावात्तपसस्तेषामृषीणां वीक्ष्य पाण्डवाः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
प्रभावात्मा जगत्कालस्तालो लोकहितस्तरुः |
१०९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
प्रभावाद्दीप्ततपसः संनिकर्षगुणान्विताः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभावाद्वासुदेवस्य मम व्याहरणादपि |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
प्रभावार्थाय़ भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
प्रभावैरन्वितास्तैस्तैः पार्थिवेन्द्राः सहस्रशः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
प्रभावय़ति राष्ट्रं च व्यवहारं कृषिं तथा ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासं च यथा तीर्थं तीर्थानां प्रवरं ह्यभूत् ||
७५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
प्रभासं चाप्यथासाद्य तीर्थं पुण्यजनोचितम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
प्रभासं चोदधौ तीर्थं त्रिदशानां युधिष्ठिर ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासं परमं तीर्थं सरस्वत्या जगाम ह ||
६९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रभासं मानसं पुण्यं पुष्कराणि महत्सरः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासतीर्थं सम्प्राप्य पुण्यं तीर्थं महोदधेः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
११९
जनमेजय़ उवाच
प्रभासतीर्थं सम्प्राप्य वृष्णय़ः पाण्डवास्तथा |
१ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
प्रभासते यथा सोमो अश्वमेधं च विन्दति ||
८० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासदेशं सम्प्राप्तं वीभत्सुमपराजितम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासन्तं भानुमन्तं महान्तं; यथादित्यं रोचमानं तथैव ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
प्रभासन्तं महावाहुं स्थितं मेरुमिवाचलम् ||
६२ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
प्रभासन्ती ज्वलन्तीव तेजसा स्वेन भारत |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य ह ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासादीनि तीर्थानि महेन्द्रादींश्च पर्वतान् |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासितमिवाकाशं चित्ररूपमलङ्कृतम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
प्रभासे त्वेकरात्रेण अमावास्यां समाहितः |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रभिन्न इव मातङ्गः प्रभञ्जन्पुष्पितान्द्रुमान् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्रभिन्न इव मातङ्गो मृद्नन्नडवनं यथा ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
प्रभिन्नकरटः प्रांशुः पद्मी विततमस्तकः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
प्रभिन्नकरटौ मत्तौ भूत्वा कुञ्जररूपिणौ |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभिन्नमिव मातङ्गं तथा क्रुद्धं तरस्विनम् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
प्रभिन्नमिव मातङ्गं परिकीर्णं करेणुभिः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
प्रभिन्नमिव मातङ्गं प्रतिद्विरदघातिनम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
प्रभिन्नमिव मातङ्गं यूथमध्ये व्यवस्थितम् |
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
प्रभिन्नमिव मातङ्गं सिंहस्कन्धं धनञ्जय़म् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
प्रभिन्नाश्च महानागा विनीता हस्तिसादिभिः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
प्रभिन्नास्तु महाकाय़ाः संनिपत्य गजा गजैः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
प्रभिन्नैरपि संसक्ताः केचित्तत्र महागजाः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
प्रभिन्नय़ोर्यथा सक्तं मत्तय़ोर्वरहस्तिनोः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
दमय़न्त्यु उवाच
प्रभुः क्षमावान्वीरश्च मृदुर्दान्तो जितेन्द्रिय़ः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
प्रभुः सङ्कल्पसिद्धोऽस्मि कामरूपी विहङ्गमः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभुः सूर्यः प्रकाशित्वे सतां चाभ्यागतः प्रभुः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
प्रभुत्वं तव सर्वत्र मय़ि चैव न संशय़ः ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
प्रभुत्वं लभते चापि धर्मस्यैतत्फलं विदुः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
प्रभुत्वं लभते जन्तुर्धर्मस्यैतत्फलं विदुः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
प्रभुत्वमिन्द्रेण समं मतं मे; द्युतिश्च नाराय़णवद्विभाति ||
१४ ख