सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्री; र्मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिर्नोपलभ्यते |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर्नोपलभ्यते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
प्रध्वस्ते कारणस्थाने सा प्रीतिर्विनिवर्तते ||
१४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
प्रनष्टं नस्तपः पुण्यं न हि नस्तन्तुरस्ति वै |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रनष्टं शन्तनोर्वंशं समीक्ष्य पुनरुद्धृतम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रनष्टः कीर्तिजः शव्दः पाण्डुना पुनरुद्धृतः ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
प्रनष्टः कुरुवंशश्च पुनर्येन समुद्धृतः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
प्रनष्टः कौरवो वंशस्त्वय़ाय़ं पुनरुद्धृतः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
प्रनष्टः शाश्वतो धर्मः सदाचारेण मोहितः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रनष्टगतय़ोऽभूवन्राजमार्गे नरैर्वृते ||
१० ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
प्रनष्टज्ञातिवीर्यस्य शून्यस्य परिधावतः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
प्रनष्टज्ञानविज्ञानाः स्वच्छन्दाचारचेष्टिताः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
प्रनष्टमप्यात्मकुलं तथा नरः; पुनः प्रकाशं कुरुते स्वकर्मभिः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
प्रनष्टसञ्ज्ञः सहसा रथोपस्थ उपाविशत् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
प्रनष्टसञ्ज्ञैः पुनरुच्छ्वसद्भि; र्मही वभूवानुगतैरिवाग्निभिः |
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
प्रनष्टा ज्योतिषां भाश्च सह सूर्येण भारत ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
प्रनष्टा योजय़ित्वास्मानकीर्त्या मुनिसत्तम ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
प्रनष्टे तु ततः शक्रे शची शोकसमन्विता |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रनष्टे तु तदा वह्नौ देवाः सर्वे सवासवाः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रनष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
प्रनृत्तः किल विप्रर्षिर्विस्मय़ोत्फुल्ललोचनः ||
९९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
प्रनृत्तमुभय़ं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ||
१०० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रनृत्तमुभय़ं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
प्रनृत्ताप्सरसं दिव्यं दिव्यस्त्रीगणसेवितम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रनृत्यदिव सङ्ग्रामे चापहस्तो धनञ्जय़ः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
प्रपक्षं स समासाद्य पार्थः काम्वोजरक्षितम् |
१०० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
प्रपक्षः शकुनिस्तेषां प्रवरैर्हय़सादिभिः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
प्रपतद्भिश्च वहुभिः शस्त्रसङ्घैर्न चुक्षुभे ||
६९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
प्रपतन्त स्म ते वीरा विरेजुर्भरतर्षभ |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
प्रपतन्तं रथात्कर्णं पश्यन्तु वसुधाधिपाः ||
८६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
प्रपतन्तो हतारोहाः कम्पय़न्ति स्म मेदिनीम् ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
प्रपतन्दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रहः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
प्रपतन्वुवुधेऽऽत्मानं व्यालीभूतमधोमुखम् ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
प्रपतामो भय़ात्तस्य सधनज्ञातिवान्धवाः ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
प्रपतेद्द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रपतेद्द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
प्रपतेद्यशसो दीप्तान्न च लोकानवाप्नुय़ात् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रपद्य च कुरुक्षेत्रं भीष्ममासाद्य चानघम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
प्रपद्य भगवन्तं ते देवा लोकपितामहम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
प्रपद्यतस्तं परमं परा भूतिर्विधीय़ते ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रपद्यस्व महावाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् |
३७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
प्रपद्ये शरणं देवं परमेण समाधिना ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
प्रपद्ये शरणं देवं शरण्यं चीरवाससम् ||
३३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
मरुत्त उवाच
प्रपद्येऽहं शर्म विप्रेन्द्र त्वत्तः; प्रय़च्छ तस्मादभय़ं विप्रमुख्य ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
प्रपद्यैवं शर्वरीमुष्य गोषु; मुनिर्वाणीमुत्सृजेद्गोप्रदाने ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
प्रपन्नः शरणं राजन्योगानामीश्वरं प्रभुम् ||
२१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
प्रपन्नवत्सलो देवः संसारात्तान्समुद्धरेत् ||
१६१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रपन्ना दीर्घमध्वानं सङ्क्षिप्तं तदमन्यत ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रपन्ना मामिय़ं वेति दय़ां कर्तुमिहार्हसि ||
१९ ख