chevron_left  प्रद्युम्नःarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
प्रद्युम्नः परिपप्रच्छ व्राह्मणैः परिकोपितः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
प्रद्युम्नचारुदेष्णादीन्रुक्मिण्या वीक्ष्य पुत्रकान् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
प्रद्युम्नमव्रवीच्छ्लक्ष्णं मधुरं वाक्यमञ्जसा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
प्रद्युम्नमुक्तान्निशितान्न शक्ताः; सोढुं कृपद्रोणविकर्णकर्णाः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
प्रद्युम्नश्च महावाहुस्त्वं च सात्वत विश्रुतः ||
९० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
प्रद्युम्नश्च महावाहुस्त्वं चैव युधि सात्वत ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रद्युम्नश्चैव साम्वश्च निशठः शङ्कुरेव च ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २२३
द्रौपद्यु उवाच
प्रद्युम्नसाम्वावपि ते कुमारौ; नोपासितव्यौ रहिते कदाचित् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
प्रद्युम्नसाम्वौ च युधि प्रवीरौ; विराटपुत्रश्च सहाभिमन्युः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
प्रद्युम्नाच्चानिरुद्धं त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
प्रद्युम्नाच्चापि निर्मुक्ता जीवं सङ्कर्षणं तथा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽहं सर्गो मम पुनः पुनः |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
प्रद्युम्नाद्योऽनिरुद्धस्तु सोऽहङ्कारो महेश्वरः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
प्रद्युम्ने पतिते राजन्परे च मुदिताभवन् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
प्रद्युम्नो भुजवेगेन शाल्वं संमोहय़न्निव ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रद्युम्नो यादृशः कृष्ण तादृशास्ते महारथाः ||
६६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
प्रद्युम्नो युय़ुधानश्च कथय़न्कत्थसे च यौ ||
६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रद्युम्नो रथिनां श्रेष्ठो हार्दिक्यमवमन्य च ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
प्रद्युम्नोऽय़मुपाय़ाति भीतस्त्यक्त्वा महाहवम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
प्रद्युम्नय़ुय़ुधानाभ्यामभिमन्योश्च ते शराः ||
१५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
प्रद्रुतं तु रथं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नस्य मारिष |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
प्रद्रुद्राव ततः सैन्यं पाञ्चालानां विशां पते |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
प्रद्विषन्ति परिख्यातं राजानमतिखादिनम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
प्रद्विष्टस्य कुतः श्रेय़ः सम्प्रिय़ो लभते प्रिय़म् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
प्रद्वेष्टि साधुवृत्तांश्च स लोकस्यैति वाच्यताम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
प्रधक्ष्यति रिपूणां ते वलानि वलिनां वरः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
प्रधक्ष्यति स पाञ्चालान्कक्षं कृष्णगतिर्यथा ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रधक्ष्यतो रणमुखे के वीराः प्रमुखे स्थिताः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रधक्ष्यन्ति रणे पार्थाः पुत्राणां मम वाहिनीम् ||
६ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रधक्ष्यन्निव लोकांस्त्रीन्कालान्तकय़मोपमः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रधर्षय़न्महावाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
प्रधर्षय़ित्वा कामाद्यो मृतो जाय़ति सूकरः ||
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
प्रधानं महदव्यक्तं विशेषान्तं सवैकृतम् |
५३ क
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
प्रधानः सोऽस्त्रविदुषां तेन कृष्णेन रक्ष्यते ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
व्रह्मो उवाच
प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतविधानवित् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
प्रधानद्वैधय़ुक्तानां जहतां कर्मजं रजः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
प्रधानवध एवास्य विनाशस्तं करोम्यहम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
प्रधानविधिय़ोगस्थस्त्वामेव विशते वुधः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
प्रधानविनिय़ोगस्थः परं व्रह्माधिगच्छति ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
प्रधानाः सर्वलोकस्य यास्वाय़त्तमिदं जगत् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
प्रधानाविति निर्दिष्टौ कामेशाभिमतौ नृणाम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
प्रधानो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः |
१८२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
प्रधावन्तोऽन्वपश्याम तव तेषां च सङ्कुले ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रधावमाना वित्रस्ता द्विजाः कुरुकुलोद्वह ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
प्रधाव्य कुञ्जरास्ते तु भीमसेनगदाहताः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
प्रध्मापितेषु शङ्खेषु संनादे लोमहर्षणे ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
प्रध्माप्य शङ्खप्रवरं पाञ्चजन्यमहं नृप ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रध्माय़ शङ्खं गाङ्गेय़ो धार्तराष्ट्रान्प्रहर्षय़न् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
प्रध्याय़मानः स तदा निःश्वसंश्च पुनः पुनः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्री; र्मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान् ||
६९ ख