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वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणं वैश्रवणाधिवासं; चकार धर्मार्थविदुत्तमौजः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणमकुर्वन्त कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
प्रदक्षिणमकुर्वन्त तदा वै पाण्डुनन्दनम् ||
४३ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणमथावृत्य राजानं पाण्डवास्तदा |
३ क
वन पर्व
अध्याय २०६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रदक्षिणमथो कृत्वा प्रस्थितो द्विजसत्तमः ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
प्रदक्षिणमभूत्सर्वं धर्मराजस्य युध्यतः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
प्रदक्षिणमवर्तन्त शुकाश्चाषाश्च भारत ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणमवर्तन्त सहिता वासवानुजम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्तो जम्वूमार्गं समाविशेत् ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ |
८८ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य गाणपत्यमवाप्नुय़ात् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य ज्येष्ठस्थानं व्रजेन्नरः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य तीर्थसेवी समाहितः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य दैवतेभ्यः प्रणम्य च ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य रथानारुरुहुः शुभान् ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य वीभत्सुं समवारय़त् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारुह्य महामनाः |
५५ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारोहं रथोत्तमम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
प्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडय़न् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणशिखो भूत्वा विधूमः समपद्यत ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रदक्षिणा ग्रहाश्चापि भविष्यन्त्यनुलोमगाः |
८८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
प्रदक्षिणा मृगाश्चैव तत्तेषां जय़लक्षणम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
प्रदक्षिणानुलोमाश्च प्रावारवसनाः सदा ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणानुलोमाश्च मङ्गल्या मृगपक्षिणः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ५०
आस्तीक उवाच
प्रदक्षिणावर्तशिखः प्रदीप्तो; हव्यं तवेदं हुतभुग्वष्टि देवः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
प्रदक्षिणाश्चैव भवन्ति सङ्ख्ये; ध्रुवं जय़ं तत्र वदन्ति विप्राः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणीकृत्य महानदीसुतं; ततो रथानारुरुहुर्मुदा युताः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
प्रदग्धाः शत्रवः पेतुरग्निदग्धा इव द्रुमाः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
प्रदत्तास्ताः प्रदातॄणां सम्भवन्त्यक्षय़ा ध्रुवाः ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददातु भवान्वित्तं यावदिच्छसि पार्थिव |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददावग्निपुत्राय़ पार्वती शुभदर्शना ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददावग्निपुत्राय़ महापारिषदावुभौ ||
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददावग्निपुत्राय़ विन्ध्यः पारिषदावुभौ ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
प्रददाह कुरून्सर्वानर्जुनः शस्त्रतेजसा |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददुः काङ्क्षमाणेभ्यः पाण्डोस्तत्रौर्ध्वदेहिकम् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ कार्त्तिकेय़ाय़ वरुणः सत्यसङ्गरः ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ कार्त्तिकेय़ाय़ वाय़ुर्भरतसत्तम ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ कुन्तिभोजाय़ सखा सख्ये महात्मने ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
प्रददौ गुरुपुत्राय़ शुकाय़ परमार्चितम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ गोसहस्राणि तीर्थेष्वाय़तनेषु च |
३ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
प्रददौ च मम प्रीतः सोऽस्त्रं पाशुपतं प्रभुः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ चापि रत्नानि विविधानि वसूनि च ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ तस्य महतो हिरण्यस्य महाद्युतिः ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ तानि वासांसि विराटदुहितुः स्वय़म् ||
३४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ तु मणिं दिव्यं वचनं चेदमव्रवीत् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ दक्षिणार्थं च पृथिवीं वै ससागराम् ||
८ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ पुरुषव्याघ्र वासुकिः पन्नगेश्वरः ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
प्रददौ श्रीमते पिण्डं नामगोत्रमुदाहरन् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ सहदेवाय़ सततं प्रिय़कारिणे |
१३ क