chevron_left  पन्नगान्गरुडश्चापिarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय २१
सूत उवाच
पन्नगान्गरुडश्चापि मातुर्वचनचोदितः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
पन्नगेभ्यो भय़ं तत्र विद्यते न स्म कौरव ||
३१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
पन्नगैरिव दीप्तास्यैर्वमद्भिरनलं रणे |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
पपात काय़ः स रथाद्वसुधामनुनादय़न् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
पपात कूपे सा वीटा तेषां वै क्रीडतां तदा |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
पपात च ततो भूमौ यथा विद्युन्नभश्च्युता ||
५९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
पपात चोच्चैरमरप्रवेरितं; विचित्रपुष्पोत्करवर्षमुत्तमम् ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
पपात चोल्का ज्वलनप्रकाशा; निशाचराश्चाप्यभवन्प्रहृष्टाः ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
पपात चोल्का महती पतिते पृथिवीपतौ ||
४७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पपात तीरे गङ्गाय़ा व्याधविद्ध इव द्विपः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
पपात देव्या धर्मात्मा वचनं चेदमव्रवीत् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पपात धरणीं तूर्णं दारय़न्तीव भारत ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पपात धरणीं तूर्णं स्वर्णवज्रविभूषितः |
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
पपात नागो धरणीधराभः; क्षितिप्रकम्पाच्चलितो यथाद्रिः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
पपात पादय़ोर्भ्रातुः संशुष्करुधिरानना ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
पपात पार्थस्य किरीटमुत्तमं; दिवाकरोऽस्तादिव पर्वताज्ज्वलन् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
पपात पुष्पवृष्टिश्च भीष्मस्योपरि पार्थिव ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पपात प्रमुखे राजन्युय़ुत्सोः काञ्चनोज्ज्वलः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवितः ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
पपात भीमसेनस्य भीष्मेण मथितो रथात् ||
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पपात भुवि दुर्धर्षो वाताहत इव द्रुमः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
पपात भुवि राजेन्द्र शुकस्यार्थे महात्मनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
पपात भूमौ दौर्वल्यात्तस्मिंश्चण्डालपक्कणे ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
पपात भूमौ निश्चेष्टः कौरव्यः परमार्तिवान् |
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
पपात मध्ये राजर्षिर्ययातिः पुण्यसङ्क्षय़े ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
पपात महती चोल्का आदित्यान्निर्गतेव ह |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
पपात महती चोल्का प्राङ्मुखी भरतर्षभ |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
पपात महती चोल्का मध्येनादित्यमण्डलम् ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
पपात महती चोल्का मध्येनादित्यमण्डलात् |
९ क
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
पपात महती चोल्का सनिर्घाता महाप्रभा |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
पपात मह्यां दुर्धर्षः पुत्रशोकसमन्वितः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
पपात यत्र वार्ष्णेय़ः सगाङ्गेय़ः सपाण्डवः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
पपात रुग्णः सनिय़न्तृकस्तथा; यथा गिरिर्वज्रनिपातचूर्णितः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
पपात रुचिरः सिंहो भीमसेनस्य नानदन् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
पपात रुधिरादिग्धं सन्दष्टदशनच्छदम् ||
६० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
पपात वृक्षात्सोद्वेगो दुःखात्परमकोपनः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
पपात शिरसा तस्मै वेपन्ती चाव्रवीदिदम् ||
२० ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
पपात शोकसन्तप्तस्ततोऽनु परवीरहा ||
१८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
पपात स द्विजस्तत्र निगूढे सलिलाशय़े |
११ क
वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
पपात स पुनर्लोकाँल्लेभे धर्मान्सनातनान् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
पपात सहसा तस्य सशरं धनुरुत्तमम् ||
६८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
पपात सहसा भूमिं विद्युज्जलधरादिव ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
पपात सहसा भूमौ वज्ररुग्ण इवाचलः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
पपात सहसा भूमौ वेपन्ती कदली यथा ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
पपात सारथिश्चास्य मुमोह गदय़ा हतः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
वैशम्पाय़न उवाच
पपाताथ च सा देवी शय़ने मूढचेतना ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
पपाताभिमुखः पार्थं छिन्नमूल इव द्रुमः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
पपाताभिमुखः शूरो यन्त्रमुक्त इव ध्वजः ||
६८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
पपाताभिमुखो दीनो मद्रराजस्त्वपाक्रमत् ||
५४ ख