उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यगूहुर्महानद्यः प्राङ्मुखाः सिन्धुसत्तमाः |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यगूहुर्महानद्यो दिशो नीहारसंवृताः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
प्रत्यगृह्णं जय़ाय़ैनं स्तूय़मानस्तदामरैः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
प्रत्यगृह्णं तदास्त्राणि महान्ति विधिवत्प्रभो ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यगृह्णंस्तदा राजञ्शरवर्षैः पृथक्पृथक् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्यगृह्णंस्तु देवाश्च तद्वचोऽङ्गिरसस्तदा ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यगृह्णन्नरव्याघ्राः शरवर्षैरनेकशः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यगृह्णाच्छिनेः पौत्रः शरैराशीविषोपमैः ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यगृह्णात्प्रहृष्टात्मा धाराधरमिवाचलः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यगृह्णाद्यथान्याय़ं यथावत्पुरुषर्षभः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यगृह्णाद्यथान्याय़ं विदुरश्च महामनाः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
प्रत्यगृह्णान्महाराज भागं पर्वणि पर्वणि ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यगृह्णान्महावाहुः प्रमुञ्चन्विशिखान्वहून् ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
प्रत्यग्रवय़सः पश्य दर्शनीय़कुचोदराः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यग्रहः कुशाम्वश्च यमाहुर्मणिवाहनम् |
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
प्रत्यग्राहय़दव्यग्रो महात्मा निय़तव्रतः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यघ्नंस्तरसा वेगं समरे हय़सादिनाम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यघ्नन्निशितैर्वाणैर्जय़गृद्धाः प्रहारिणः ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यजानात्तदा राजन्पितुः प्रिय़चिकीर्षय़ा ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
प्रत्यतिष्ठंश्च तेष्वेव तान्येव स्थापय़न्ति च |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यत घोरेण शरवर्षेण संवृतः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यत यत्कर्णः पाञ्चालांस्त्वरितो यय़ौ ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यत शैनेय़ो निघ्नन्वहुविधान्रथान् ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यत सञ्छन्ना तथा वाणैर्महात्मनः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यन्त रथिनो धावमानाः समन्ततः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र ज्वलिता इव पावकाः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र सेन्द्रा इव दिवौकसः ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यन्त शूराणामन्योन्यमभिधावताम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
प्रत्यदृश्यन्त सङ्ग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यदृश्यन्त समरे तावका निहताः परैः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यदृष्यत धर्मात्मा मार्कण्डेय़ो महातपाः ||
३९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
भीम उवाच
प्रत्यनीके व्यवस्थाप्य भीमसेनमरिन्दमम् |
६९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
प्रत्यनुनय़े भवन्तावश्विनौ |
७४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यपद्यत राजानं मग्नं वै व्यसनार्णवे ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यपद्यत हार्दिक्यः कृतवर्मा तदन्तरम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यपद्यन्त ते सर्वे रथान्स्वान्पुरुषर्षभाः |
९७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
प्रत्यपश्यज्जलधरं कुण्डधारमवस्थितम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यपादय़दाग्नेय़मस्त्रं धर्मभृतां वरः ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यपादय़दाचार्यः प्रीय़माणो धनञ्जय़म् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यपिंषन्महावाहुर्मल्लं भुवि वृकोदरः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
प्रत्यभाषत तं विप्रं प्रतिनन्द्य दिवाकरः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां रथर्षभम् ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
प्रत्यभाषत धर्मात्मा भोःशव्देनानुनादय़न् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यभिजानाति मां भवानिति ||
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
प्रत्यभिज्ञातमात्रोऽथ सद्भिस्तैर्नरपुङ्गवः |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यभिज्ञाय़ मेधावी समाश्वासय़त प्रभुः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यभ्ययात्तं विप्रोढा कृत्येव दुरधिष्ठिता ||
५२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यभ्यर्च्य हली सर्वान्क्षत्रिय़ांश्च महामनाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
प्रत्यमित्रं निषेवस्व प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यमित्रमुपाय़ान्तं मर्दय़ामास मार्गणैः ||
१४ ख