शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजग्राह समरे सेनापतिरमित्रजित् ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिजग्राह सौमित्रिर्विनद्योभौ पतत्रिभिः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२३२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजज्ञे गुरोर्वाक्यं कौरवाणां विमोक्षणम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिजज्ञे च काकुत्स्थः समरे वालिनो वधम् |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजज्ञे च दाशार्हस्तस्य जीवितमच्युतः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजज्ञे च राज्याय़ द्रुपदो वदतां वरः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
प्रतिजज्ञे दृढक्रोधो द्रौणिर्यत्र महारथः |
१८० क
वन पर्व
अध्याय
११७
अकृतव्रण उवाच
प्रतिजज्ञे वधं चापि सर्वक्षत्रस्य भारत ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रतिजल्पन्ति वै धीराः सदा उत्तमपूरुषाः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
प्रतिजानन्ति पूर्वाह्णे व्ययं व्यसनजं तव ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
प्रतिजानामि ते सत्यं गमिष्यसि नराधिप |
९ क
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजानीम ते सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि ||
३१ ग
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
प्रतिजानीष्व तं कर्तुमतो वेत्स्याम्यहं परम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
प्रतिजानीहि चाद्रोहं व्राह्मणानां नराधिप ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजानीहि नैतांस्त्वं प्राप्य क्रोधं विमोक्ष्यसे |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञा चापि ते नित्यं श्रुता द्रोणस्य माधव ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिज्ञा तेऽन्यथा राजन्विचेष्टा चान्यथा तव |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिज्ञा वहुलाः कृत्वा धृतराष्ट्रमुपागमन् ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञा सत्यसन्धस्य गाण्डीवं प्रति विश्रुता ||
१०७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञा सिन्धुराजस्य वधे राजीवलोचन ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिज्ञा सूतपुत्रस्य विजय़स्य वधं प्रति ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
प्रतिज्ञां चाधिरोहस्व मनसा कर्मणा गिरा |
११२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञां तां च सङ्ग्रामे धर्मराजस्य पूरय़न् ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
भीमसेन उवाच
प्रतिज्ञां तामनिस्तीर्य ततस्तत्कृतवानहम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
प्रतिज्ञां दुष्करां कृत्वा पितुरर्थे कुलस्य च |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सात्यकिरु उवाच
प्रतिज्ञां पारय़िष्यामि काम्वोजानेव मा वह |
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिज्ञां पालय़न्धीमाञ्जातः परपुरञ्जय़ः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञां पालय़िष्यामि हत्वेमं नरसत्तमम् |
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञां भीमसेनस्य पूर्णामेवाभ्यमन्यत ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
प्रतिज्ञां रक्षमाणस्य सद्वृत्तं स्मरतस्तथा ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
प्रतिज्ञां वितथां कुर्यामिति राजन्पुनः पुनः ||
३२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञां श्रावय़ामास पुनरेव तवात्मजम् ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
अर्जुन उवाच
प्रतिज्ञां षण्ढकोऽस्मीति करिष्यामि महीपते |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञां सफलां कुर्यादिति ते समचिन्तय़न् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञां स्मरता चैव भीमसेनेन पातितः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञाकर्मदक्षस्य रणे गाण्डीवधन्वनः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिज्ञातं च तेनैतद्ग्रहणं मे महारथ ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञातं च तेनोग्रं स भज्येत न संनमेत् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
प्रतिज्ञातं तु भीमेन द्यूतकाले धनञ्जय़ |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिज्ञातं महाभागास्तच्छीघ्रं संविधीय़ताम् ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
प्रतिज्ञातं मय़ा यत्ते तद्गृहाणाविचारितम् ||
१०४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञातः सभामध्ये सर्वेषामेव संय़ुगे ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञातमुपप्लव्ये यत्तत्पार्थेन पूर्वतः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञाते तु पार्थेन सिन्धुराजवधे तदा |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रतिज्ञाते तु भीष्मेण तस्मिन्युद्धे सुदारुणे |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिज्ञाते फल्गुनस्य वधे कर्णेन संय़ुगे |
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रतिज्ञाते फल्गुनेन वधे भीष्मस्य सञ्जय़ |
१ क
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञातो वने वासो राजमध्ये मय़ा ह्ययम् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
प्रतिज्ञातो हि भवता दुःखप्रतिनय़ो मम |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिज्ञातो हि सेनाय़ा मध्ये तेन वधो मम ||
१३ ख