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अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
सूर्य उवाच
प्रतिगृह्णीष्व पद्भ्यां च त्राणार्थं चर्मपादुके ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्णीष्व पुत्रं स्वं मय़ा दत्तमनिन्दितम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते मय़ा दत्ता द्विजोत्तम ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्णीष्व मत्तस्त्वं साधु व्राह्मणपुङ्गव ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
भगवानु उवाच
प्रतिगृह्णे वरं वीरावीप्सितश्च वरो मम |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
प्रतिगृह्य च तत्सर्वं दृष्ट्वा चैव स्वय़ंवरम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
प्रतिगृह्य च तां कन्यां गालवः सह पक्षिणा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
प्रतिगृह्य च तां कन्यां च्यवनः प्रससाद ह |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य च तां पार्थः पुरस्कृत्य जनार्दनम् |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य च तां पूजां करे च विनिवेश्य तम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
प्रतिगृह्य च तां पूजां जनकाद्द्विजसत्तमः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिगृह्य च तां पूजां द्विजः पप्रच्छ तावुभौ |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
प्रतिगृह्य च तां पूजां पाण्डवाज्जनमेजय़ात् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
प्रतिगृह्य च तां पूजां प्रत्यनन्दमृषीनहम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य च तान्सर्वान्द्रोणो वचनमव्रवीत् |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रतिगृह्य च तामाज्ञां तव पुत्रस्य पार्थिवाः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
प्रतिगृह्य च यो दद्याद्गाः सुशुद्धेन चेतसा |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
प्रतिगृह्य च विश्वात्मा स्वय़म्भूरमितप्रभः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
प्रतिगृह्य च सत्कारमर्घादिं भोजनं वरम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य ततः पूजां तत्कालसदृशीं तदा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
प्रतिगृह्य ततो द्रोणः कृतकृत्योऽभवत्तदा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
प्रतिगृह्य ततो धर्मस्तथैवोष्णं तथा नवम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं कृतास्त्रो द्विजसत्तमः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य तु तद्द्रव्यं कृष्णद्वैपाय़नः प्रभुः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं नृपं सर्वे प्रणम्य च |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं रथस्थो रथसत्तमः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सम्प्रहृष्टो मय़स्तदा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य तु तां पूजां नारदो भगवानृषिः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
प्रतिगृह्य तु तां पूजां पार्थिवाद्भगवानृषिः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २००
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिः प्रीतमनाभवत् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
प्रतिगृह्य तु तां भार्यामुतथ्यः सुमनाभवत् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
प्रतिगृह्य तु सन्देशं ततस्ते सगरात्मजाः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
प्रतिगृह्य ददौ लोके मानुषे व्रह्मवित्तम ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य धरां राजन्व्यासः सत्यवतीसुतः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
प्रतिगृह्य नरव्याघ्र त्वत्तो भिक्षां गतव्यथः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
प्रतिगृह्य भवेद्देय़मेष धर्मः सनातनः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्य वरं देवास्तस्माद्विवुधसत्तमात् |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
प्रतिगृह्य वरौ तौ च गरुडो विष्णुमव्रवीत् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
प्रतिगृह्य स तां कन्यां गालवं प्रतिनन्द्य च |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३०
सूत उवाच
प्रतिगृह्यतामिदानीं मे सख्यमानन्त्यमुत्तमम् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्याभवत्प्रीता तानि वासांसि भामिनी ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्यार्जुनः सर्वमुपभुज्य च पाण्डवः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिगृह्याशिषो मुख्यास्तदा धर्मभृतां वरः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
प्रतिग्रहं ये नेच्छेय़ुस्तेऽपि रक्ष्यास्त्वय़ानघ ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
प्रतिग्रहकृतैर्दोषैः सर्वैः स परिमुच्यते ||
१४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
ऋषभ उवाच
प्रतिग्रहमहं राज्ञां न करिष्ये कथञ्चन |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
वृषादर्भिरु उवाच
प्रतिग्रहस्तारय़ति पुष्टिर्वै प्रतिगृह्णताम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
प्रतिग्रहागता विप्रे क्षत्रिय़े शस्त्रनिर्जिताः |
१ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
प्रतिग्रहादुपावृत्तः सन्तुष्टो निय़तः शुचिः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिग्रहार्थं कृष्णस्य यमौ प्रास्थापय़त्तदा ||
३० ख