उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
प्रजावत्यो व्रूहि समेत्य ताश्च; युधिष्ठिरो वोऽभ्यवदत्प्रसन्नः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
प्रजावांस्तेन भवति यथा जनय़िता तथा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
प्रजावाञ्श्रोत्रिय़ो यज्वा मुक्तो दिव्यैस्त्रिभिरृणैः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
शुक उवाच
प्रजावाञ्श्रोत्रिय़ो यज्वा वृद्धः प्रज्ञोऽनसूय़कः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
प्रजावान्वाहनाढ्यश्च वहुपुत्रश्च जाय़ते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
प्रजाविनय़रक्षार्थं धर्मस्यात्मा सनातनः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
जनमेजय़ उवाच
प्रजाविरहितो वापि भूतपूर्वः कदाचन ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
प्रजाविसर्गं च सुखेन काले; प्रत्येत्य देवेषु सुखानि भुक्त्वा |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
प्रजाविसर्गं तु सशेषकालं; स्थानानि स्वान्येव सरन्ति जीवाः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भरद्वाज उवाच
प्रजाविसर्गं विविधं कथं स सृजते प्रभुः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
प्रजाविसर्गं विविधं मानसो मनसासृजत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
प्रजाविसर्गस्य च पारिमाण्यं; वापीसहस्राणि वहूनि दैत्य ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
प्रजाश्च तस्य क्षीय़न्ते ताश्च सोऽनु विनश्यति ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
प्रजाश्च तस्य वर्धन्ते ध्रुवं च महदश्नुते ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजाश्च मुदिता भूत्वा भोजने च यथा पुरा ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
प्रजाश्च यौवनप्राप्ता विनशिष्यन्त्यनो तव |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
प्रजाश्चतुर्विधास्तेन जिता राजन्महात्मना |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रजाश्चेमाः प्रपश्यामि विचित्रा वहुधाकृताः ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
प्रजासंहरणे क्षुव्धौ समुद्राविव दुस्तरौ |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
प्रजासंहरणे राजन्सोमं सप्त ग्रहा इव ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
प्रजासंहरणे सूर्यः क्रूरैरिव महाग्रहैः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजासङ्क्षेपसमय़े दण्डहस्तमिवान्तकम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजासर्गकरो व्रह्मा तमुवाच जगत्पतिः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
स्थाणुरु उवाच
प्रजासर्गनिमित्तं मे कार्यवत्तामिमां प्रभो |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
प्रजासर्गमुपादाय़ नैकं युगविपर्ययम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
प्रजासर्गेण दारैश्च व्रह्मचर्येण वा पुनः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रजासु तासु सर्वासु रूपेणाप्रतिमाभवत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
प्रजासु व्याधय़श्चैव मरणं च भय़ानि च ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
प्रजास्तं चान्वरज्यन्त धर्मनित्यं मनस्विनम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
प्रजास्तत्र विवर्धन्ते वर्षास्विव समुद्रगाः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
प्रजास्त्वय़ेमा निय़मेन संय़ता; निय़म्य चैता नय़से न कामय़ा |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मातर ऊचुः
प्रजास्माकं हृतास्ताभिस्त्वत्कृते ताः प्रय़च्छ नः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रजास्यति महाराज तदा सङ्क्षेप्स्यते युगम् ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
प्रजाहितार्थमारम्भो गरुडस्य तपोधनाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजाय़न्ते सुतान्नार्यो दुःखेन महता विभो |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
देवा ऊचुः
प्रजाय़स्व ततो लोकानुपभोक्तासि शाश्वतान् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रजाय़ां रक्ष्यमाणाय़ामात्मा भवति रक्षितः ||
६१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
प्रजाय़ां रक्ष्यमाणाय़ामात्मा भवति रक्षितः ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
प्रजाय़ेतामुभे राजञ्शरीरशकले तदा ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
प्रजोच्छेदमिमं मह्यं सर्वं सोमपसत्तम |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
प्रजोच्छेदो मम कृतो यस्माद्युष्माभिरद्य वै |
५० क
वन पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा; धर्मं च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
प्रज्ञा धर्मे च रमते धर्मं चैवोपजीवति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
प्रज्ञा नैःश्रेय़सी लोके प्रज्ञा स्वर्गो मतः सताम् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रज्ञा पराय़णं तज्ज्ञं सद्धर्मनिरतं शुचिम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
प्रज्ञा प्रतिष्ठा भूतानां प्रज्ञा लाभः परो मतः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
प्रज्ञा संय़ोजय़त्यर्थैः प्रज्ञा श्रेय़ोऽधिगच्छति |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
प्रज्ञां च देवीं सुभगे विमृश्य; पृच्छामि त्वां का ह्यसि चारुरूपे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
प्रज्ञाकरणसंय़ुक्तं ततो वुद्धिः प्रवर्तते ||
१ ख