chevron_left  प्रकृत्याarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
प्रकृत्या सर्गधर्मिण्या तथा त्रिविधसत्त्वय़ा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
मुनिरु उवाच
प्रकृत्या ह्युपपन्नोऽसि वुद्ध्या चाद्भुतदर्शन ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
प्रकृत्यात्मानमेवात्मा एवं प्रविभजत्युत ||
२४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रिय़माणानि सर्वशः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रकृत्यैव दुराधर्षा दृढप्राकारतोरणा ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रकृष्टं मे वय़ः पुत्र पुण्यं चीर्णं यथावलम् |
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५२
ऋषय़ ऊचुः
प्रकृष्टमेतत्कुरुणा महात्मना; ततः कुरुक्षेत्रमितीह पप्रथे ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकृष्टाः पुण्यतः काश्च ज्ञेय़ा नद्यः पितामह ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
शिलवृत्तिरु उवाच
प्रकृष्टाः पुण्यतः काश्च ज्ञेय़ा नद्यस्तदुच्यताम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
प्रकृष्टैरशुभैर्ग्रस्ताननेकैः पुरुषाधमान् |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रक्रिय़ेय़ं ततो युक्ता भवेत्तव नराधम ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रक्रिय़ेय़ं न ते युक्ता वहिस्त्वं क्षत्रधर्मतः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
प्रक्रीडन्निव राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
प्रक्लेदः क्षुद्रता स्नेह इत्यापो ह्युपदिश्यते |
६ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रक्षाल्य वारिणा नेत्रे आचम्य च यथाविधि |
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
प्रक्षिप्तं नश्यति क्षिप्रं यथा नश्यत्यसौ तथा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
भीष्म उवाच
प्रक्षिप्याथ च कुम्भान्वै पारगामिनमारभेत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
प्रक्षीणसाय़काः शूरा निहताश्वाः श्रमातुराः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रक्षीय़ते धनोद्रेको जनानामविजानताम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
प्रक्षीय़माणं तं वुद्ध्वा जलस्थाय़ं भय़ागमे |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
शौनक उवाच
प्रक्ष्यामि चैव भूय़स्त्वां यथावत्सूतनन्दन |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
प्रक्ष्वेड्यास्फोट्य संहृष्टा वीरलोकं यिय़ासवः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
प्रक्षय़े जगतस्तीव्रे युगान्त इव भारत ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
प्रक्षय़े दारुणे जाते संहारे सर्वदेहिनाम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
प्रख्याता त्रिषु लोकेषु या सा वेनमजीजनत् ||
९९ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं निहनिष्यन्ति मा शुचः ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
प्रगल्भं दक्षिणं दान्तं वलिनं युक्तकारिणम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
प्रगल्भाश्चानुरक्ताश्च ते तव स्युः परिच्छदाः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगाढं तुमुलं चित्रमतिविद्धं प्रजापतेः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
प्रगाढमञ्जोगतिभिर्नाराचैरभिताडिताः |
११६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३६
सञ्जय़ उवाच
प्रगाढमञ्जोगतिभिर्नाराचैरभिपीडिताः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
प्रगृहीतगदौ दृष्ट्वा दुर्योधनवृकोदरौ |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
प्रगृहीतमहाखड्गौ तौ चर्मवरधारिणौ |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
प्रगृहीतमहाचापौ शरशक्तिगदाय़ुधौ ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
प्रगृहीतश्च योऽमात्यो निगृहीतश्च कारणैः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृहीता व्यरोचन्त यक्षराक्षसवाहुभिः ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
प्रगृहीताग्रहस्तेन वैराटिरपि दन्तिना |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृहीताय़ुधाः सर्वे धार्तराष्ट्रानभिद्रवन् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
प्रगृहीताय़ुधान्वाहून्योधानामभिधावताम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रगृहीताय़ुधाश्चापि तस्थुः पुरुषसत्तमाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
प्रगृहीतेन काष्ठेन राक्षसोऽभ्येति भीषणः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
प्रगृहीतैः सुसंरव्धा धावमानास्ततस्ततः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
प्रगृहीतैर्दितेः पुत्राः प्रादुरासन्सहस्रशः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्णन्नञ्जलीन्नॄणामुद्यतान्सर्वतोदिशम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य कार्मुकं घोरं कालदण्डोपमं रणे ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य कार्मुकश्रेष्ठं जातरूपपरिष्कृतम् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य क्षिप्रमापेतुः परस्परजिगीषय़ा ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य खड्गं च रथान्महात्मा; प्रस्कन्द्य कुन्तीसुतमभ्यधावत् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
प्रगृह्य च कुरुश्रेष्ठः साङ्गदं दक्षिणं भुजम् |
२१ क