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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
प्रकुर्यां सुमहत्कर्म न मे तत्साधु संमतम् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
प्रकुर्वाते ध्वजौ युद्धं प्रत्यहेषन्हय़ान्हय़ाः ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकृतिं चापि वेत्थास्य विकृतिं चापि भूय़सीम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
प्रकृतिं चाप्यतिक्रम्य गच्छत्यात्मानमव्ययम् |
९१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
प्रकृतिं ते भजिष्यन्ति नष्टप्रकृतय़ो जनाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
प्रकृतिं त्वभिजानाति निर्गुणत्वं तथात्मनः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
प्रकृतिं यान्ति भूतानि भूलिङ्गशकुनिर्यथा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
प्रकृतिं सर्वभूतानां पश्यन्त्यध्यात्मचिन्तकाः ||
११४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय़ सम्भवाम्यात्ममाय़या ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
प्रकृतिः कुरुते कर्म शुभाशुभफलात्मकम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
प्रकृतिः कुरुते देवी महाप्रलय़मेव च |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
प्रकृतिः सर्वभूतानां भूमिर्वै शाश्वती मता ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
प्रकृतिः सा परा मह्यं रोदसी योगधारिणी |
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वासुदेव उवाच
प्रकृतिः सा मम परा न क्वचित्प्रतिहन्यते |
४२ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकृतिः सा हि कामस्य पावकस्यारणिर्यथा ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
प्रकृतिः सृजते तद्वदानन्त्यान्नापचीय़ते ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
प्रकृतिर्गुणान्विकुरुते स्वच्छन्देनात्मकाम्यया |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
प्रकृतिर्विकारः प्रलय़ः प्रधानं प्रभवाप्ययौ ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
प्रकृतिश्च तदश्नाति त्रिषु लोकेषु कामगा ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत्कारणं भुवः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
प्रकृतिस्तथा विकुरुते पुरुषस्य गुणान्वहून् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
प्रकृतिस्थं गिरिं दृष्ट्वा प्रीता देवी महेश्वरम् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
प्रकृतिस्थश्चापदि वर्तमान; उभौ गर्ह्यौ भवतः सञ्जय़ैतौ ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
प्रकृतिस्था विषीदन्ति जले सैकतवेश्मवत् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
प्रकृतिस्थो हि मे शल्य इदानीं संमतस्तथा |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
प्रकृतीनां च कौन्तेय़ राजा दीनां विभावय़ेत् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रकृतीनां तु तद्वाक्यं देशकालोपसंहितम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १९६
द्रोण उवाच
प्रकृतीनामनुमते पदे स्थास्यन्ति पैतृके ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
प्रकृतेः क्रिय़माणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
प्रकृतेरनय़त्वेन तासु तास्विह योनिषु |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
प्रकृतेर्विक्रिय़ापत्तिः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
प्रकृतेश्च गुणानां च पञ्चविंशतिकं वुधाः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
प्रकृतेश्च विकाराणां द्रष्टारमगुणान्वितम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
प्रकृतेस्तु विकारा ये क्षेत्रज्ञस्तैः परिश्रितः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
प्रकृतेस्त्रिगुणाय़ास्तु सेवनात्प्राकृतो भवेत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
प्रकृतौ च विकारे च न मे प्रीतिर्न च द्विषे |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
प्रकृत्या क्षेत्रभूतास्ता नराः क्षेत्रज्ञलक्षणाः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
प्रकृत्या घोररूपं तदासीद्घोरतरं पुनः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
प्रकृत्या चाय़ुधोपेतं विशेषेण तदानघ ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
प्रकृत्या चैव राजेन्द्र नमिश्रोऽन्यश्च दृश्यते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
प्रकृत्या नित्यसलिलो नित्यमध्ययने रतः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
प्रकृत्या निर्गुणस्त्वेष इत्येवमनुशुश्रुम ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
प्रकृत्या पापसत्त्वश्च तुल्यचेताश्च दस्युभिः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
धृतराष्ट्र उवाच
प्रकृत्या मन्युमान्वीरः कथमासीत्परन्तपः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
प्रकृत्या विषमं दुर्गं प्रकृत्या च सुरक्षितम् |
१७ क