उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
पृष्ट्वा सर्वान्कुशलं तांश्च सूत; पश्चादहं कुशली तेषु वाच्यः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ट्वा सुखमथो राज्ञः पृष्ट्वा राज्ञा च भारत ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
मार्कण्डेय़ उवाच
पृष्टय़ा मुनिना वीर शृणु तार्क्ष्येण धीमता ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठं भीमस्य रक्षन्तः शरवर्षेण वारणान् |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठगोपस्तु कर्णस्य ज्येष्ठः पुत्रो महारथः |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठगोपास्तु तस्यासन्नानादेश्या जनेश्वराः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठगोपास्तु तस्यासन्सौमदत्तिपुरोगमाः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठगोपास्तु भीष्मस्य पुत्रास्तव नराधिप |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठगोपो भवत्वद्य मम पार्थो धनञ्जय़ः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठगोपोऽर्जुनस्यापि युय़ुधानो महारथः |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ठगोपौ च तस्याथ हत्वा परमसाय़कैः |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठच्छिन्नाञ्शिरश्छिन्नान्पार्श्वच्छिन्नांस्तथापरान् |
११० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठच्छिन्नान्विचरणान्विमस्तिष्केक्षणाङ्गुलीन् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
पृष्ठतः के परान्वीरा उपासेधन्यतव्रताः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
पृष्ठतः परिपूर्णार्थैः षड्भिरङ्गैरलङ्कृतम् ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
पृष्ठतः परिवर्तन्त्याः पश्चिमं निःसृतं मुखम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतः पाण्डवानीकमभ्यघ्नन्निशितैः शरैः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
पृष्ठतः पार्श्वतश्चान्या यावत्यस्ताः प्रधारणाः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
पृष्ठतः शकटानीकं कलत्रं मध्यतस्तथा ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतः सर्वसैन्यानां मुदितो वै सकेशवः ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतः सर्वसैन्यानां स्थितौ व्यूहस्य दंशितौ ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतः सात्यकिं यान्तमन्वधावन्नमर्षिताः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतः सैन्धवः कार्यः सर्वैर्गुप्तो महारथैः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
पृष्ठतः सोमसङ्काशे उदक्चैवाभ्रसंनिभे ||
१२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
पृष्ठतश्च समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ||
५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ठतस्तु वरारोहा श्यामा पद्मदलेक्षणा |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
पृष्ठतस्त्वानुय़ास्यामि सत्येनात्मानमालभे ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ठतो द्रौपदीं चैव सुभद्रां च यशस्विनीम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतो द्रौपदेय़ाश्च सौभद्रश्चापि वीर्यवान् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतो द्रौपदेय़ाश्च सौभद्रश्चैव वीर्यवान् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
पृष्ठतो धनुरादाय़ ससार गहने वने ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतो नोत्सहे कर्तुं त्वां वा त्यक्तुं महीपते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
पृष्ठतो भीरवः सङ्ख्ये वर्तन्तेऽधमपूरुषाः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ठतो वाय़सः कृष्णो याहि याहीति वाशति |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
पृष्ठतो विजय़स्यापि याति रुद्रस्य पट्टिशः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि त्वामहं सहसैनिकः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि समेषु विषमेषु च |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सार्थहीन इवाध्वगः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
पृष्ठतोऽनुव्रजन्तं वा का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ठतोऽनुय़युः कृष्णं रथैरश्वैर्गजैरपि ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतोऽनुय़युः शूरा मघवन्तमिवामराः ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
पृष्ठतोऽनुय़यू राजन्सर्वे सुप्रीतमानसाः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ठतोऽनुय़यौ कृष्णमृत्विक्पौरजनैर्वृतः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठतोऽनुय़यौ चैनं स्रवद्भिः पर्वतोपमैः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
पृष्ठतोऽनुय़यौ यान्तं वरदं वृषभध्वजम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
पृष्ठतोऽन्वगमद्राजन्रन्ध्रान्वेषी तदा सदा ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
पृष्ठमर्वुदमेवासीत्सहस्राणि च विंशतिः |
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
पृष्ठमांसं वृथामांसं पुत्रमांसं च तत्समम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
शुक्र उवाच
पृष्ठमांसं समश्नातु दिवा गच्छतु मैथुनम् |
२४ क