शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
पृथुरैलो मय़ो भौमो नरकः शम्वरस्तथा |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
पृथुवक्त्रा मधुरिका मधुकुम्भा तथैव च ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
पृथुश्च विपृथुश्चैव समीकोऽथारिमेजय़ः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथुस्तूत्पादय़ामास धनुराद्यमरिन्दम |
८४ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पृथूदकमिति ख्यातं कार्त्तिकेय़स्य वै नृप |
१२२ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पृथूदकात्पुण्यतमं नान्यत्तीर्थं नरोत्तम |
१२८ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पृथूदके जप्यपरो नैनं श्वोमरणं तपेत् ||
१२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
पृथूदके जप्यपरो नैनं श्वोमरणं तपेत् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पृथूदके नरश्रेष्ठ प्राहुरेवं मनीषिणः ||
१२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
पृथे राजकुले जन्म रूपं चाद्भुतदर्शनम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
पृथे वालेति कृत्वा वै सुता चासि ममेति च ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
पृथेय़ं द्रौपदी चैव ताः पश्य पुरुषोत्तम ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
पृथोश्च राजन्वैन्यस्य तथेक्ष्वाकोर्महात्मनः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पृथ्वक्षा नीलकण्ठाश्च तथा परिघवाहवः ||
१०३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवदेवर्षिसेवितम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
पृथ्वाद्यैर्भ्रातृभिः सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम् ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
पृथ्वाय़तांसः पृथुदीर्घवाहु; र्वृकोदरः पश्यत पश्यतैनम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
पृथ्वी पञ्चगुणा ज्ञेय़ा त्रसस्थावरसङ्कुला |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
पृथ्वीं सागरपर्यन्तां पालय़िष्यति चैव ह ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
पृथ्वीमिमां यद्यपि रत्नपूर्णां; दद्यान्नदेय़ं त्विदमव्रताय़ |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
वृषादर्भिरु उवाच
पृथ्वीवाहान्पीवरांश्चैव ताव; दग्र्या गृष्ट्यो धेनवः सुव्रताश्च ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
पृथ्व्या नरः पश्यति नान्तमस्या; ह्यन्तश्चास्या भविता चेति विद्धि |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
पृश्निगर्भ त्रितं पाहीत्येकतद्वितपातितम् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
पृश्निगर्भस्त्वमेवैकस्त्रिय़ुगं त्वां वदन्त्यपि ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
पृश्निरित्युच्यते चान्नं वेदा आपोऽमृतं तथा |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
पृषदाज्योद्भवः श्रीमांस्त्रिलोकविजय़ी नृपः ||
७५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
पृषध्रनवमानाहुः क्षत्रधर्मपराय़णान् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
७७
शर्मिष्ठो उवाच
पृष्टं तु साक्ष्ये प्रवदन्तमन्यथा; वदन्ति मिथ्योपहितं नरेन्द्र |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्टः सन्कामय़ा व्रूहि कस्त्वं वानररूपधृक् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
पृष्टवाननुपूर्वेण प्रश्नमुत्तममर्थवत् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
मार्कण्डेय़ उवाच
पृष्टवानसि यं तात धर्मं धर्मभृतां वर ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्टवान्केशवं राजन्फल्गुनः परवीरहा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
पृष्टश्च गोत्रचरणं स्वाध्याय़ं व्रह्मचारिकम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
पृष्टश्च तेन वहुशः प्राप्तं कथमरिन्दम |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
पृष्टश्च तेन विप्रेण दृष्टं त्वेतन्निदर्शनम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
पृष्टश्चागमने हेतुमुवाच विनतासुतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
पृष्टश्चाह वलं विद्धि यतो वृत्तमहं ततः |
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
पृष्टश्चाहं तमवोचं महर्षिं; सूतोऽहमस्मीति स मां शशाप |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
व्रह्मो उवाच
पृष्टस्तु नानृतं व्रूय़ात्तस्माद्वक्ष्यामि ते वलिम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
धृतराष्ट्र उवाच
पृष्टस्त्वमेतदाचक्ष्व कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
पृष्टस्त्वय़ा चास्मि यथा नरेन्द्र; तथा मय़ेदं त्वय़ि चोक्तमद्य |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
पृष्टा आसनपालाश्च न जानीमेत्यथाव्रुवन् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
महेश्वर उवाच
पृष्टाश्चोपासिताश्चैव तास्त्वय़ा देवि नित्यशः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
पृष्टेन चापि वक्तव्यमेष धर्मः सनातनः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
पृष्टो गृहीतस्तत्कारी तज्ज्ञैर्दृष्टः सकारणः |
९४ क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
पृष्टो मय़ापत्यहेतोः स महात्मा महातपाः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
पृष्टो यदव्रुवं सत्यं व्यभिचारोऽत्र को मम ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
पृष्टो हि साक्षी यः साक्ष्यं जानमानोऽन्यथा वदेत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
पृष्टो हीदं प्रीतिमता हितार्थं; व्रूय़ात्सुतस्येह यदुक्तमेतत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
पृष्ट्वा कौशलमन्योन्यं रथेष्वेवावतस्थिरे ||
२८ ख