आदि पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
पृच्छामि त्वां नृपते व्रूहि सत्यं; कुतश्च कस्यासि सुतश्च कस्य |
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
अष्टक उवाच
पृच्छामि त्वां मा प्रपत प्रपातं; यदि लोकाः पार्थिव सन्ति मेऽत्र |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
महेश्वर उवाच
पृच्छामि त्वां वरारोहे पृष्टा वद ममेप्सितम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
वसुमना उवाच
पृच्छामि त्वां वसुमना रौशदश्वि; र्यद्यस्ति लोको दिवि मह्यं नरेन्द्र |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
धृतराष्ट्र उवाच
पृच्छामि त्वां विदुर प्रश्नमेतं; भवन्ति वै कानि महाकुलानि ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
पृच्छामि त्वां विदुर व्रूहि नस्ता; न्यैर्दीव्यामः शतशः संनिपत्य ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
शिविरु उवाच
पृच्छामि त्वां शिविरौशीनरोऽहं; ममापि लोका यदि सन्तीह तात |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
धृतराष्ट्र उवाच
पृच्छामि त्वां सञ्जय़ राजमध्ये; किमव्रवीद्वाक्यमदीनसत्त्वः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
युधिष्ठिर उवाच
पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे व्रूहि पितामह ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
युधिष्ठिर उवाच
पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
प्रतर्दन उवाच
पृच्छामि त्वां स्पृहणीय़रूप; प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोकाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
पृच्छामि भगवंस्तस्मात्को भवानिह तिष्ठति ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
पृच्छे त्वा शुष्कमेतं वै कस्मान्न त्यजसि द्रुमम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
पृच्छेः क्व यास्यसीत्येवं शपेय़ं त्वामिति प्रभो ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
नारद उवाच
पृच्छेत्त्वां यदि केनाहं तवाख्यात इति स्म ह |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
७२
दमय़न्त्यु उवाच
पृच्छेथाः पुरुषं ह्येनं यथातत्त्वमनिन्दिते ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
पृच्छैनं सुमहाभागमेतद्गुह्यं सनातनम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
पृतनां पाण्डवेय़ानां पातय़ानो महारथः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
युधिष्ठिर उवाच
पृतनामध्य एते हि गतसत्त्वा महावलाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
पृतनाय़ाः प्रशस्तानि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
पृतनाय़ाः प्रशस्तानि तानीहेच्छामि वेदितुम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
पृथक्कर्माणि तेषां तु प्रवक्ष्यामि यथातथम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
पृथक्कलासमूहस्य सामग्र्यं तदिहोच्यते ||
१०६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथक्काञ्चनसंनाहान्रथेष्वश्वानय़ोजय़न् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
पृथक्चमूभ्यां संसक्तौ द्रोणमेवाभ्यधावताम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
पृथक्तु विनिविष्टानां धर्मं धीरोऽनुरुध्यते |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
युधिष्ठिर उवाच
पृथक्त्वं लभ्यते चैषां धर्मश्चैकस्त्रय़ं कथम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
पृथक्त्वात्सम्प्रय़ोगाच्च नासूय़ुर्वेद शाश्वतम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
पृथक्त्वादाश्रमाणां च वर्णान्यत्वे तथैव च |
१८० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
पृथक्त्वे चैव मे वुद्धिस्त्रय़ाणामपि वै तथा ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
पृथक्त्वेन द्रुता राजन्सङ्क्षिप्य महतीं श्रिय़म् |
४८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
पृथक्त्वेन हि भूतानां विषय़ा वै गुणाः स्मृताः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथक्पृथक्चैव दशाय़ुतान्वितं; धनं ददौ सौमकिरग्निसाक्षिकम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
पृथक्पृथक्तु पश्यन्ति येऽल्पवुद्धिरता नराः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथक्पृथगतीवैनं मानार्हं समपूजय़न् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
पृथक्पृथगनुप्राप्तौ पृथगक्षौहिणीवृतौ ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
पृथक्पृथग्लोकपालाः समेता; ददुर्ह्यस्त्राण्यप्रमेय़ाणि यस्य |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथक्पृथग्वंशकरा नृपतय़ः |
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
पृथक्पृथङ्महाराज कृष्णपार्थावविध्यताम् ||
७९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
पृथक्षराभ्यां चिच्छेद कृतहस्तः प्रतापवान् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
पृथक्षास्त्रविदः सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदाः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
पृथगक्षौहिणीनां च प्रणेतॄन्नरसत्तमान् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
पृथगक्षौहिणीभ्यां तावभिय़ातौ सुय़ोधनम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
पृथगक्षौहिणीभ्यां तावुभौ संय़ति दारुणौ |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
पृथगक्षौहिणीभ्यां तौ पाण्डवानभिसंश्रितौ |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
पृथगाचरतस्तात पृथगात्मनि चात्मनोः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
पृथगात्मा दशात्मानः संश्लिष्टा जतुकाष्ठवत् ||
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
कपिल उवाच
पृथगाश्रमिणां कर्माण्येकार्थानीति नः श्रुतम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
पृथगेकशरारुग्णा निपेतुस्ते गतासवः ||
३९ ख