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सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
पत्नीभ्यां सहितो राजा सर्वरत्नैरतोषय़त् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
पत्नीमतः सहस्राणि प्राय़च्छं दश सप्त च ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
पत्नीमृतावनुप्राप्य सद्यस्त्यक्ष्यसि जीवितम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
पत्नीर्दृष्ट्वा द्विजेन्द्राणां वह्निः कामवशं यय़ौ ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
पत्नीशाला कृता यस्य परेषां वाहिनीमुखम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
पत्नीसरूपतां कृत्वा कामय़ामास पावकम् ||
१३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
पत्न्यः पतीन्व्युच्चरन्त पत्नीश्च पतय़स्तथा ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
पत्न्या तपत्या सहितो यथा शक्रो मरुत्पतिः ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
पत्न्या सह वसत्येको वने श्वापदसेविते ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
पत्न्या सहानय़ा वीर चरिष्यामि तपः परम् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
सौदास उवाच
पत्न्यास्ते मम विप्रर्षे रुचिरे मणिकुण्डले |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
पत्न्यो वै तस्य राजेन्द्र सोमस्य शुभलक्षणाः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
पत्यभावे यथा स्त्री हि देवरं कुरुते पतिम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
पत्यर्थं देवगर्भाभे मा वृथा यौवनं कृथाः ||
९ ग
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
पत्या निय़ुक्ता या चैव पत्न्यपत्यार्थमेव च |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पतिः ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
पत्याश्रय़ो हि मे धर्मो मतः स्त्रीणां सनातनः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
पत्युद्गम्याथ विव्याध सात्यकिस्तं शितैः शरैः |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
पत्यौ च ते नकुले याज्ञसेनि; वदन्त्वेते वचनं त्वत्प्रसूतम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
पत्यौ स्त्री तु तदा राजन्पुरुषो वा स्त्रिय़ं प्रति |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
पत्यौ हते सुपर्णेन कृपणा दीनचेतना ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
पत्रं पुष्पं फलं तोय़ं यो मे भक्त्या प्रय़च्छति |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
पत्रवानर्कपर्णश्च प्रय़ुतश्चैव विश्रुतः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
पत्राहारैरश्मकुट्टैर्दन्तोलूखलिकैस्तथा |
१० क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
पत्रिणः पुष्पितानेतान्संश्लिष्यन्ति महाद्रुमान् ||
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
पत्रिभिः सुदृढैराशु धनुश्चैव महाद्युते ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
पत्री हय़ी नागरथप्रय़ाय़ी; व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
पत्रैः स्निग्धैरविरलैरुपेतां मृदुभिः शुभाम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
पतय़ो वान्धवाः स्त्रीणां व्राह्मणा वेदवान्धवाः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
पथा नैकेन गच्छन्ति घूर्णमानास्ततस्ततः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
पथि गच्छता मय़ा ऋषभो दृष्टः |
१७१ क
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
पथि प्रच्छन्नमासेदुर्धार्तराष्ट्रभय़ात्तदा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
पथि सङ्गतमेवेदं दारवन्धुसुहृद्गणैः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
पथि सङ्गतमेवेदं दारैरन्यैश्च वन्धुभिः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०७
भीष्म उवाच
पथि सङ्गतमेवेदं दारैरन्यैश्च वन्धुभिः |
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
पथिषु प्रवला भूत्वा कदासमृदितेऽध्वनि |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
पथ्यं च भरतश्रेष्ठ निगृह्णीय़ां वलेन तम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
पथ्यं भुक्त्वा नरो लोभाद्योऽन्यदश्नाति भोजनम् |
७७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
पथ्यं राजन्व्रवीमि त्वां तत्परासुः स्मरिष्यसि ||
४९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
पथ्यतिष्ठन्त सहिता विष्वक्सेनदिदृक्षय़ा ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
पदं कृत्वाप्नुय़ाल्लक्ष्यं तस्मादत्र विधीय़ताम् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
पदं पदसहस्रेण यश्चरन्नापराध्नुय़ात् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
पदं मध्यममास्थाय़ कोशसङ्ग्रहणं चरेत् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
पदं यथा न दृश्येत तथा ज्ञानविदां गतिः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
पदमन्ववरोहन्ति प्राप्तस्य परमां गतिम् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
पदवन्धं ततश्चक्रे पाण्डवः परवीरहा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
पदवीं दुर्गमां घोरामगम्यामकृतात्मभिः ||
४२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
पदवीं प्रेषितश्चैव फल्गुनस्य मय़ा रणे |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
पदवीं प्रेषय़िष्यामि माधवस्य महात्मनः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
पदवीमस्य गच्छ त्वं मा विचारय़ पाण्डव ||
३३ ख