कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च मातुलः सव्यसाचिनः |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैव्यश्च नरपुङ्गवः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
पुरुमित्रो जय़ो भोजः काम्वोजश्च सुदक्षिणः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
पुरुमित्रो जय़ो भोजः सौमदत्तिश्च वीर्यवान् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
पुरुमित्रो विकर्णश्च शकुनिश्चापि सौवलः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
पुरुषं चापश्यद्दर्शनीय़म् ||
१४८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषं तं न पश्यामि यः सहेत महाव्रतम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
पुरुषं त्विदानीमाख्याहि यश्च सर्वधनी नरः ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
पुरुषं पुण्डरीकाक्षं किं वक्ष्यामि महाभुजम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
युधिष्ठिर उवाच
पुरुषं योजय़त्येव फलय़ोगेन भारत ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषं विश्वकर्माणं सत्त्वय़ोगं ध्रुवाक्षरम् ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
पुरुषं व्यञ्जय़न्तीह लोके कलुषय़ोनिजम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
उत्तङ्क उवाच
पुरुषं शाश्वतं दिव्यं स्रष्टारं जगतः प्रभुम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
अर्जुन उवाच
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
पुरुषं सनातनं विष्णुं यत्तद्वेदविदो विदुः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
पुरुषं समतिक्रम्य आकाशं प्रतिपद्यते ||
१२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
पुरुषं सृजतेऽविद्या अग्राह्यममृताशिनम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
पुरुषः कर्मसाध्येषु स्याच्चेदय़मकारणम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषः पुरुषं गच्छेन्निष्क्रिय़ः पञ्चविंशकम् ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
पुरुषः प्रकृतिं ज्ञात्वा तय़ोरेकतरं भजेत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
पुरुषः प्रकृतिर्वुद्धिर्विशेषाश्चेन्द्रिय़ाणि च |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
पुरुषः फलमाप्नोति चतुर्थं नात्र कारणम् |
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
पुरुषः श्रिय़माप्नोति न घृणित्वेन कर्हिचित् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः |
८७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
पुरुषः सनातनतमो यतः कृष्णस्ततो जय़ः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
पुरुषः सर्वमित्येव श्रूय़ते वहुधा विभुः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
स्त्र्यु उवाच
पुरुषत्वं कथं त्यक्त्वा स्त्रीत्वं रोचय़से विभो ||
४६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
पुरुषत्वमथ स्त्रीत्वं मत्तो यदभिकाङ्क्षसि ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
पुरुषत्वे सुता यूय़ं स्त्रीत्वे चेमे शतं सुताः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
पुरुषप्रय़त्नजं केचित्त्रैधमेतन्निरुच्यते ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
पुरुषश्चापि मय़ा दृष्टः |
१६९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
पुरुषश्चाप्रमेय़ात्मा यं सर्वमृषय़ो विदुः |
३२ क
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
पुरुषश्चाप्रमेय़ात्मा शङ्खचक्रगदाधरः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
पुरुषश्चैको निर्गुणो विश्वरूप; स्तं निर्गुणं पुरुषं चाविशन्ति ||
१० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
पुरुषस्तद्विजानीते तस्मात्क्षेत्रज्ञ उच्यते |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
पुरुषस्य परे लोके कीर्तिरेव पराय़णम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषस्य हि दृष्ट्वेमामुत्पत्तिमनिमित्ततः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
पुरुषस्यात्मनिःश्रेय़ः शुभाशुभनिदर्शनम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
पुरुषस्याध्रुवे देहे कामस्य वशवर्तिनः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषस्याप्रमेय़स्य सत्यस्यामिततेजसः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
पुरुषस्यैष निय़मो मन्ये श्रेय़ो न संशय़ः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
पुरुषा वपुषा युक्ता युक्ताः प्रसवजैर्गुणैः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
पुरुषांश्चादिशं प्राज्ञान्कन्यावृत्तान्तकर्मणि |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
पुरुषाः प्रेष्यतामेके निर्गच्छन्ति धनार्थिनः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
पुरुषाः समलञ्चक्रुरुपजह्रुश्च भोजनम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
वृहस्पतिरु उवाच
पुरुषाणां प्रदुष्टानां स्वभावो वलवत्तरः ||
५० ख