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वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
पुरराष्ट्राणि चिन्वन्तो नैषधं सह भार्यया ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
पुरश्च पश्चाच्च यथा महानदी; पुरर्क्षवन्तं गिरिमेत्य नर्मदा ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
पुरस्कार्याः सदा सैन्ये हन्यन्ते घ्नन्ति चापि ते ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
पुरस्कुर्वीत कार्येषु कृष्ण कार्यार्थसिद्धय़े ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
पुरस्कृत्य महाराज भीमसेनघटोत्कचौ |
७५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पुरस्कृत्य महावाहुरुत्तताराकुलेन्द्रिय़ः ||
१ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
पुरस्कृत्य यय़ुर्वज्रं पौत्रं कृष्णस्य धीमतः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
पुरस्कृत्य रणे पार्थान्द्रोणमभ्यद्रवद्द्रुतम् ||
७४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
पुरस्कृत्य रणे पार्थो भीष्मस्याय़ोधनं गतः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
पुरस्कृत्य रणे भीष्मं पाण्डवानभ्यवर्तत ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
पुरस्कृत्य रणे भीष्मं सर्वसैन्यपुरस्कृतम् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
पुरस्कृत्येह भवतः समानेष्यामहे मखम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
पुरस्कृत्योपय़ास्यन्ति वासुदेवं महारथाः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
पुरस्ताच्चैव देवस्य नन्दिं पश्याम्यवस्थितम् |
१४४ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
द्रौपद्यु उवाच
पुरस्तात्करणीय़ं मे न कृतं कार्यमुत्तरम् |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
पुरस्तात्काञ्चनी वेदिः प्रादुरासीन्महात्मनः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
पुरस्तात्के च वीरस्य युध्यमानस्य संय़ुगे ||
३६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
पुरस्तात्तस्य यानस्य याजकाश्च ततो यय़ुः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
पुरस्तात्पृष्ठतश्चैव पार्श्वतश्चैव सर्वतः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
पुरस्तात्सैन्धवानीकं द्रोणानीकस्य पृष्ठतः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
पुरस्तादक्षय़ौ दत्तौ तूणौ येनास्य खाण्डवे ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
पुरस्तादेव ते वुद्धिरिय़ं कार्या विजानतः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
राजपुत्र उवाच
पुरस्तादेव भगवन्मय़ैतदपवर्जितम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
पुरस्ताद्दारुणो भूत्वा सुचित्रतरमेव तत् ||
१ ग
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
पुरस्ताद्दूषितं नित्यं त्वय़ा भक्षय़ता नरान् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
पुरस्ताद्देवदेवस्य जगुर्गीतानि सर्वशः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
पुरस्ताद्भावितात्मानो यथावच्चरितव्रताः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
पुरस्ताद्भूतपूर्वत्वाद्धीनभाग्यो हि दुर्मतिः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
पुरस्ताद्विष्ठितं दृष्ट्वा ममेशानं च भारत |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
पुरस्ताद्विष्ठितः शर्वो ममासीत्त्रिदशेश्वरः ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
पुरस्ताद्व्रह्मणस्तत्र लोकास्तेजोमय़ाः शुभाः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मनश्चार्यं न वाह्यतः ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन्यस्मिन्नावसथे वसेत् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
पुरस्यास्याविनाशाय़ तच्च राजंस्तथा कुरु ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४१
शिशुपाल उवाच
पुरा कथय़तां नूनं न श्रुतं धर्मवादिनाम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
पुरा करोति निःशेषां पाण्डवानामनीकिनीम् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
पुरा करोति सोऽन्तकः प्रमादगोमुखं दमम् |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
ऋषय़ ऊचुः
पुरा किल कुरुं राम कृषन्तं सततोत्थितम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
पुरा किल सुराः सर्वे ऋषय़श्च समागताः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
दुर्योधन उवाच
पुरा कुर्वन्ति निःशेषं रक्ष्यमाणाः किरीटिना ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
पुरा कुसङ्गतानि ते सुहृन्मुखाश्च शत्रवः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्रं वृत्रनिवर्हणे |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
पुरा कृतय़ुगे तात ऋषिरासीन्महाय़शाः |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वासुदेव उवाच
पुरा कृतय़ुगे तात चार्वाको नाम राक्षसः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
पुरा कृतय़ुगे तात राजासीदविकम्पकः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा कृतय़ुगे राजन्नार्ष्टिषेणो द्विजोत्तमः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
पुरा गोषूपनीतासु गोषु सन्दिग्धदर्शिना |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
ऋषय़ ऊचुः
पुरा च राजर्षिवरेण धीमता; वहूनि वर्षाण्यमितेन तेजसा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
पुरा च विभ्रमन्ति ते दिशो महाभय़ागमे ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
पुरा च सोमोऽध्वरगोऽवलिह्यते; शुना यथा विप्रजने प्रमोहिते |
१९ ख