द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पुनर्भीमं महावाहुर्धर्मपुत्रोऽभ्यभाषत ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्भीमो वलादेनं विचकर्ष महावलः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
पुनर्भेदश्च मे युक्तो यदा साम न गृह्यते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
पुनर्मातलिना सार्धमगच्छं देवसद्म तत् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
पुनर्मेघमहावातौ पुनर्वज्रमहाचलौ |
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्यथागतं जग्मुः सर्वभक्षश्च सोऽभवत् ||
१९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
पुनर्यद्युक्तो न करिष्यते वच; स्ततो वज्रं सम्प्रहर्तास्मि तस्मै ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
पुनर्यास्यन्त्यरण्याय़ कौन्तेय़ास्तमनुव्रताः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
पुनर्युक्त्वा वासुदेवं प्रय़ातं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पुनर्युद्धाय़ गच्छन्ति जय़गृद्धाः प्रमन्यवः ||
५२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
पुनर्युद्धाय़ निर्जग्मुः क्षत्रिय़ाः कालचोदिताः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
पुनर्युद्धाय़ संमन्त्र्य क्षत्रिय़ास्तस्थुरव्यथाः |
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
पुनर्युद्धाय़ सञ्जग्मुस्तापय़ानाः परस्परम् ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
पुनर्युद्धाय़ समरे प्रय़युर्भीमपार्षतौ ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्युवा च भवति तस्मात्तं शन्तनुं विदुः ||
४८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
पुनर्वने न दुःखी स्या इति चोद्धर्षणं कृतम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्वर्धिष्यते देवास्तद्वै सत्यं वचो मम ||
६७ ग
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्वलिभृतश्चैव चक्रे सर्वमहीक्षितः ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्वसनमुत्क्षिप्य प्रतरिष्यन्निव स्थलम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्वहुमृगं रम्यं काम्यकं काननोत्तमम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
पुनर्वहुविधा माय़ाः प्राकुर्वन्नमितौजसः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
पुनर्वाय़ुपथं भ्रान्तं मनो भवति वाय़ुवत् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध तं षष्ट्या पुनश्च नवभिः शरैः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध दशभिर्निशितैर्नतपर्वभिः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध नाराचैः सप्तभिः स्वर्णभूषितैः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध विंशत्या तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध विंशत्या पुत्राणां प्रिय़कृत्तव ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध विंशत्या शराणां नतपर्वणाम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध विंशत्या शरैः संनतपर्वभिः ||
३० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध विंशत्या साय़कानां हसन्निव ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध सप्तत्या ननाद च महावलः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध सप्तत्या सारथिं चास्य सप्तभिः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
पुनर्विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
पुनर्वृद्धिक्षय़ात्किञ्चिदभिवृत्तं निशामय़ेत् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
पुनर्वेत्स्यसि तां लक्ष्मीमेष पन्थाः सनातनः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
धृतराष्ट्र उवाच
पुनर्वो विग्रहो मा भूत्खाण्डवप्रस्थमाविश ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
पुनर्व्रह्मवसातीय़ाञ्जघान रथिनो दश |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च कर्णं त्रिभिरष्टभिश्च; द्वाभ्यां चतुर्भिर्दशभिश्च विद्ध्वा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
पुनश्च जवमास्थाय़ जवनो मृगय़ूथपः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
व्यास उवाच
पुनश्च जातो विख्यातो वसिष्ठकुलनन्दनः ||
५४ ग
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
पुनश्च तादृशीमेव वापीं जलजशालिनीम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च तुमुलं शव्दं श्रुत्वार्जुनमभाषत ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
पुनश्च धनुरादाय़ महास्त्राणि प्रमुञ्चता |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छय़ा |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च निशितैर्वाणैः पार्थं विव्याध पञ्चभिः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पुनश्च पतिते चक्रे व्यसनार्तः पराजितः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
पुनश्च पप्रच्छ सरिद्वरासुतं; ततः परं धर्ममहीनसत्त्वः ||
४८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनश्च परिपप्रच्छ भीष्मं धर्मभृतां वरम् |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
पुनश्च परिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिनः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनश्च पाणिमभ्येति मम दैत्यान्विनिघ्नतः ||
२४ ख