chevron_left  पुनरेवाव्रवीद्देवarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवाव्रवीद्देव इदं वचनमुत्तमम् ||
१२ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवाव्रवीद्धीमानिदं वचनमर्थवत् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवाव्रवीद्धीमान्युधिष्ठिरमिदं वचः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
पुनरेवाव्रवीद्राजन्हर्षय़न्निव पाण्डवम् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवाव्रवीद्वाक्यं कालवादी महातपाः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
पुनरेवाव्रवीद्वाक्यं यत्तच्छृणु नराधिप ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवाव्रवीद्वाक्यमिदं भरतसत्तम ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
युधिष्ठिर उवाच
पुनरेवेह मे वुद्धिः संशय़े परिमुह्यते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनरेवोत्तरं वाक्यमुक्तवन्तौ नरर्षभौ ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभय़ः ||
१३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
पुनरेष्यन्ति ते हस्तं यदा कालो भविष्यति ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
पुनर्गच्छ प्रमत्तस्य वाहुकस्योपसंस्कृतम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
पुनर्गत्वा ततो राजन्मौनमातिष्ठदुत्तमम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छत सञ्जय़म् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छद्यथातथम् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छद्यथातथम् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
पुनर्घोरेण नादेन पाण्डवस्य महात्मनः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
पुनर्जातमिवात्मानं मन्वानाः पार्थिवास्तदा |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्जातानिति स्मैतान्मन्यन्ते सर्वपार्थिवाः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
सुधन्वो उवाच
पुनर्ददामि ते तस्मात्पुत्रं प्रह्राद दुर्लभम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
अर्जुन उवाच
पुनर्ददौ सुरपतिर्मह्यं वर्म ससङ्ग्रहम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुचः पृथिवीपते ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
पुनर्दीव्याम भद्रं ते वनवासाय़ पाण्डवैः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्दृष्टानि तान्येव प्रीणय़न्ति न नस्तथा |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १६९
वसिष्ठ उवाच
पुनर्दृष्टिप्रदानेन राज्ञः सन्त्रातुमर्हसि ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
भीष्म उवाच
पुनर्देवासुरं युद्धं भावि जेतास्मि वस्तदा ||
३१ ग
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्द्यूतं प्रकुर्वन्तु मामकाः पाण्डवैः सह ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
पुनर्द्यूते च पार्थेन वधः कर्णस्य शंश्रुतः ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
श्रीभगवानु उवाच
पुनर्द्रक्ष्यसि चानेकसहस्रय़ुगपर्ययान् ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
पुनर्द्रक्ष्याव इत्युक्त्वा प्रतस्थे सह कन्यया ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
पुनर्द्रष्टासि कर्णस्य निष्ठामेतां तथात्मनः ||
३५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
पुनर्द्रोणस्य जुगुपे चक्रमेव महावलः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
पुनर्द्रौणिं च सप्तत्या शराणां सोऽभ्यताडय़त् ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
पुनर्द्रौणिमहाशैलं नाराचैः सूर्यसंनिभैः |
४४ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवाः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
पुनर्द्विपान्द्विपारोहान्वैजय़न्त्यङ्कुशध्वजान् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्द्वैतवनं रम्यमाजगाम युधिष्ठिरः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
पुनर्न च पिवेद्राजन्संस्कृतः शुध्यते नरः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
पुनर्नरत्वं सम्प्राप्य भवेत्स पृथिवीपतिः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
पुनर्नरो म्रिय़ते जाय़ते च; पुनर्नरो हीय़ते वर्धते पुनः |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
पुनर्नरो याचति याच्यते च; पुनर्नरः शोचति शोच्यते पुनः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
पुनर्नवमिमं लोकं कुर्वन्निव सपत्नहन् ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनर्नवीकृतः शोको गान्धार्या जनमेजय़ ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
पुनर्निवेशनं तस्यां कृतवन्तो वय़ं नृप |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
पुनर्निय़न्तॄन्सह पादगोप्तृभि; स्ततस्तु चुक्रोध गिरिव्रजेश्वरः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
पुनर्नो देवलः क्षुद्रो नूनं छेत्स्यति दुर्मतिः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
पुनर्नय़विचारेण त्रय़ीसंवरणेन च ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
पुनर्भरतवंशस्य हेतुं सन्तानवृद्धय़े |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
पुनर्भवान्पार्थिवं तं समेत्य; वाक्यं मदीय़ं प्रापय़ स्वार्थय़ुक्तम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
पुनर्भावोऽपि सङ्ख्यातो नास्ति किञ्चिदिहाचलम् ||
६ ख