chevron_left  नागोarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय २१
भीमसेन उवाच
नागो विल्वमिवाक्रम्य पोथय़िष्याम्यहं शिरः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
नागोद्भेदे नरः स्नात्वा नागलोकमवाप्नुय़ात् |
१२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
नाग्निं परित्यजेज्जातु न च वेदान्परित्यजेत् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
नागय़क्षमनुष्याणां पतत्रिमृगपक्षिणाम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
नागय़ोनौ यदा चैव तदा वर्तामि नागवत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
नाघ्नतः कीर्तिरस्तीह न वित्तं न पुनः प्रजाः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
नाचक्षुर्वेत्ति पन्थानं नाचक्षुर्विन्दते दिशः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
नाचरिष्यन्परे धर्मं परे परतरे च ये |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
नाचरेत्तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सय़ेत् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
नाचार्यः कामवाञ्शिष्यैर्द्रोणो युध्येत जातु चित् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
नाचार्याय़ेहोपकृत्वा प्रवादं; प्राज्ञः कुर्वीत नैतदहं करोमि |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
नाचिकेतं पिता दृष्ट्वा पतितं दुःखमूर्छितः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
नाचिकेताय़ भगवानाह वैवस्वतो यमः |
१६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
नाचिन्तय़त तान्वाणान्पार्थचापच्युतान्युधि ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
नाच्छिन्दे चापि निर्दिष्टमिति जानीहि पार्थिव |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
नाच्छिन्द्यात्स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप |
७५ क
आदि पर्व
अध्याय २२०
वैशम्पाय़न उवाच
नाजहत्पुत्रकानार्ता जरिता खाण्डवे नृप |
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
नाजहात्पृष्ठतो वीरमद्यापि मधुसूदन ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
नाजानन्त शिरांस्युर्व्यां पतितानि नरर्षभाः |
४० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
नाजानन्पितरः पुत्रान्भ्रातॄन्भ्रातर एव च ||
९१ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
नाजानाद्दिवसं यान्तं चिन्तय़ानः समागमम् ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
जरासन्ध उवाच
नाजितान्वै नरपतीनहमादद्मि कांश्चन |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय ३९
अर्जुन उवाच
नाजित्वा विनिवर्तामि तेन मां विजय़ं विदुः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
नाजेय़ोऽस्त्यनय़ोर्लोके कृष्णय़ोरिति मे मतिः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
नाज्ञातिरनुगृह्णाति नाज्ञातिर्दिग्धमस्यति |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
नाज्ञातैः सह गच्छेत नैको न वृषलैः सह ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्वाह्वाने फलद्वय़म् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
नाज्ञासिषुर्धावमाना वहवश्च महारथाः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
नाज्ञाय़त ततः किञ्चित्पुनरेव विशां पते |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
नाज्ञाय़त तदा शत्रुर्न सुहृन्न च किञ्चन ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
नाज्ञाय़न्त रणे वीरा न दिशः प्रदिशस्तथा ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
नाडाय़नी चेन्द्रसेना यथैव; वश्या नित्यं मुद्गलस्याजमीढ |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय २०
भीमसेन उवाच
नाडाय़नी चेन्द्रसेना रूपेण यदि ते श्रुता |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
नाडीजङ्घ इति ख्यातो दय़ितो व्रह्मणः सखा |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
नातः कार्यतमं मन्ये रणे भीष्मस्य रक्षणात् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
नातः क्रूरतरं कर्म पुनः कर्तुं त्वमर्हसि ||
९० ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
नातः परं त्वय़ा शक्यं गन्तुमाश्वसिहि प्रभो ||
८० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
नातः परं वैनतेय़ किञ्चित्पापिष्ठमुच्यते |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
नातः परं हि नारीणां कार्यं किञ्चन विद्यते |
५९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
नातः पापीय़सीं काञ्चिदवस्थां शम्वरोऽव्रवीत् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
नातः पापीय़सीं काञ्चिदवस्थां शम्वरोऽव्रवीत् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
वसिष्ठ उवाच
नातः पुण्यतरं दानं नातः पुण्यतरं फलम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
नातः श्रीमत्तरं किञ्चिदन्यत्पथ्यतमं तथा |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
नातः सुखतरं किञ्चिल्लोके क्वचन विद्यते ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
नातप्ततपसः पुंसो नामहाय़ज्ञय़ाजिनः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
नातप्ततपसः पुत्र प्राप्नुवन्ति महत्सुखम् ||
१२ ख