शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
नष्टे शरीरे नष्टं स्याद्वृथा च स्यात्क्रिय़ापथः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
युधिष्ठिर उवाच
नष्टेऽग्नौ हव्यमवहदग्निर्भूत्वा महानृषिः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
नष्टैरिव विचिन्वद्भिर्गतिमिष्टां ध्रुवामितः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
नष्टो न दृश्यते यत्र शमीगर्भे हुताशनः ||
१२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लव्धा त्वत्प्रसादान्मय़ाच्युत |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
नष्टौ पुनर्वलात्काल आनय़त्यमितद्युतिः |
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
नसमं रौक्मिणेय़ाहं रणं मत्वापय़ाम्यहम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
नसमानीह हीनानि तानि पुण्यतमान्यपि ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भृगुरु उवाच
नहुषं पापकर्माणमैश्वर्यवलमोहितम् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
नहुषं प्रति संवादमगस्त्यस्य भृगोस्तथा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
वृहस्पतिरु उवाच
नहुषं याचतां देवी किञ्चित्कालान्तरं शुभा |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
नहुषं वृद्धशर्माणं रजिं रम्भमनेनसम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
नहुषः पालय़ामास व्रह्मक्षत्रमथो विशः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
नहुषः पूर्वमालेभे त्वष्टुर्गामिति नः श्रुतम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
नहुषस्तां ततो दृष्ट्वा विस्मितो वाक्यमव्रवीत् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
नहुषस्तु ततः श्रुत्वा च्यवनं तं तथागतम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
नहुषस्तु ततः श्रुत्वा महर्षेर्वचनं नृप |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
नहुषस्य किमर्थं वै मर्षय़ाम महामुने ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
नहुषस्य च संवादं महर्षेश्च्यवनस्य च ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
नहुषस्य यय़ातिः ||
७ 8
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
नहुषस्य यय़ातिस्तु राजर्षिर्देवसंमितः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
नहुषस्य वचः श्रुत्वा गविजातः प्रतापवान् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
शल्य उवाच
नहुषस्य वधोपाय़ं लोकपालैः सहैव तैः |
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
नहुषस्य समीपस्थो गविजातोऽभवन्मुनिः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
नहुषेण विसृष्टा च निश्चक्राम ततः शुभा |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
नहुषेण विसृष्टा च वृहस्पतिमुवाच सा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१०१
देवा ऊचुः
नहुषेणाभितप्तानां त्वं लोकानां गतिः पुरा |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
नहुषो जनय़ामास षट्पुत्रान्प्रिय़वाससि ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
नहुषो देवराजः सन्क्रीडन्वहुविधं तदा ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
नहुषो देवि शक्रश्च सुरैश्वर्यमवाप्स्यति ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
नहुषो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
नहुषो नाम राजाहमासं पूर्वस्तवानघ |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
नहुषो नेति तानाह तमसा मूढचेतनः ||
९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
नहुषो हि महाराज राजर्षिः सुमहातपाः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
नहुषोऽपि त्वय़ा राजंस्तस्माच्छापात्समुद्धृतः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
नहुषोऽपि वरं लव्ध्वा प्रविवेश पुरं स्वकम् ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
नाकमावृत्य तिष्ठन्तमुच्छ्रय़ेण महागिरिम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पत तदा भीमो भिद्यमान इवाचलः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
नाकम्पत तदा वीरः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०८
नार्यु उवाच
नाकम्पत महातेजाः स्थितस्तपसि निर्मले ||
२० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पत महाराज क्षितिकम्पे यथाचलः ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पत महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पत महाराज भीमं चार्छच्छितैः शरैः ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पत महावाहुः स्वधैर्यं समुपाश्रितः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पत महावाहुर्मैनाक इव पर्वतः ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
नाकम्पत महावाहुर्हिमवानिव सुस्थिरः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पत महावाहुस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पय़त शैनेय़ं शीघ्रो वाय़ुरिवाचलम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पय़त शौरिं सा विन्ध्यं गिरिमिवानिलः |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
नाकम्पय़त संरव्धो वार्योघ इव पर्वतम् ||
१७ ख