अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
न वै निष्ठाकरं शुल्कं ज्ञात्वासीत्तेन नाहृतम् |
३० क
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
न वै परीक्षसे सम्यगसह्यं शत्रुसम्भवम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
न वै पापैर्ह्रिय़ते कृष्यते वा; यो व्राह्मणो यजते वेदशास्त्रैः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
न वै प्रभग्नान्पश्यामि मारुतेन कथञ्चन ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
जय़द्रथ उवाच
न वै प्राज्ञा गतश्रीकं भर्तारमुपय़ुञ्जते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
न वै भिन्ना गौरवं मानय़न्ति; न वै भिन्नाः प्रशमं रोचय़न्ति ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
न वै भिन्ना जातु चरन्ति धर्मं; न वै सुखं प्राप्नुवन्तीह भिन्नाः |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
न वै भीष्माद्भय़ं किञ्चित्कर्तव्यं युधि सृञ्जय़ाः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
न वै मदन्यां जननीं जानीय़ातामिमाविति ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
न वै मम हितं पूर्वं मातृवच्चेष्टितं त्वय़ा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
न वै मानं च मौनं च सहितौ चरतः सदा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
जाजलिरु उवाच
न वै मुनीनां शृणुमः स्म तत्त्वं; पृच्छामि त्वा वाणिज कष्टमेतत् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
न वै मूर्तिप्रदानेन न जम्वुकशतैरपि |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
न वै मृत्युर्व्याघ्र इवात्ति जन्तू; न्न ह्यस्य रूपमुपलभ्यते ह ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
न वै मोक्षस्तदा वोऽभूद्विना कृष्णामनिन्दिताम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
न वै यथापूर्वमिवासि पुत्र; चिन्तापरश्चासि विचेतनश्च |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
ऐल उवाच
न वै वातं परिवृनोति कश्चि; न्न जीमूतो वर्षति नैव दावः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१३३
द्वारपाल उवाच
न वै वालाः प्रविशन्त्यत्र विप्रा; वृद्धा विद्वांसः प्रविशन्ति द्विजाग्र्याः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
न वै विभीषिकां काञ्चिद्राजन्कुर्वन्ति पाण्डवाः ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
न वै विवित्सान्तरमस्ति वादिनां; महाजले हंसनिनादिनामिव ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
न वै वृद्धो वालमतिर्भवेद्राजन्कथञ्चन |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
द्रुपद उवाच
न वै शक्यं विहितस्यापय़ातुं; तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो व्राह्मणो न च व्राह्मणः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो व्राह्मणो न च व्राह्मणः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
न वै श्रुतं धार्तराष्ट्रेण वाक्यं; सम्वोध्यमानं विदुरेण चैव |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
न वै सतां वृत्तमेतत्परिवादो न पैशुनम् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
न वै समृद्धिं पालय़ते लघीय़ा; न्यत्त्वं सभामेष्यसि राजपुत्रि ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
न वैनतेय़ो गरुडः प्रशंसति महाजनम् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
न वैरमुद्दीपय़ति प्रशान्तं; न दर्पमारोहति नास्तमेति |
९३ क
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
न वैराण्यभिजानन्ति गुणान्पश्यन्ति नागुणान् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
न वैश्यशूद्रौपय़िकीः कथास्ता; न च द्विजातेः कथय़न्ति वीराः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
न वो मदन्यः प्रसहेद्रणेऽर्जुनं; क्रमागतं मृत्युमिवोग्ररूपिणम् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
न वो विज्ञास्यते कश्चित्त्रिषु लोकेषु भारत ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
न वोऽन्यदिह कर्तव्यं किञ्चिदूर्ध्वं यथाविधि |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
न वोऽस्ति कुत्सितं किञ्चिदङ्गेष्वालक्ष्यतेऽनघाः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
न वोऽस्त्यस्मिन्सुते स्नेहो वाले मधुरभाषिणि |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
न व्यङ्गां न परिश्रान्तां दद्याद्गां व्राह्मणाय़ वै ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
न व्यथा शृण्वतः काचिद्विद्यते मम सञ्जय़ |
४९ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
न व्यपत्रपसे कस्माद्वृद्धः सन्कुलपांसनः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
न व्यवस्यन्ति पाण्डूनां प्रदातुं पैतृकं वसु ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
न व्याजहार तस्थौ च प्रह्वा भगवदुन्मुखी ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
अर्जुन उवाच
न व्याजेन चरेद्धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
५१
दुर्योधन उवाच
न व्याधय़ो नापि यमः श्रेय़ःप्राप्तिं प्रतीक्षते |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
न व्यालजं भय़ं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
न व्याहरति चैवैनं जैगीषव्यः कथञ्चन |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
न व्याहरति यद्युक्तं तस्याधर्मो गवानृतम् ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
न व्यूहो भिद्यते तत्र कौरवाणां कथञ्चन |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
न व्येति हृदय़ाद्राज्ञो दुर्मनाः स कृशोऽभवत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
न व्रतानि चरिष्यन्ति व्राह्मणा वेदनिन्दकाः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
न व्रतैर्नोपवासैश्च न प्रसूत्या न मन्युना ||
४ ख