शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
न पश्यथ सुतस्नेहं यादृशः पशुपक्षिणाम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
न पश्यसि भय़ं घोरं द्रोणान्नः समुपस्थितम् ||
१५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
न पश्यामि तदित्येवं पितरं सोऽव्रवीन्मुनिः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
न पश्यामि नरश्रेष्ठं तेन तप्ये वृकोदर ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
न पश्यामि महावाहुं तेन तप्ये वृकोदर ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
न पश्यामि महीपालं सात्वतीपुत्रतेजसा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
न पश्यामोऽनपहृतं धनं किञ्चित्क्वचिद्वय़म् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
न पश्येम कुरून्सर्वान्पाण्डवांश्चैव संय़ुगे |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो मुनिः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न पाणिभ्यां न वाहुभ्यां पादोरुभ्यां न चानघ |
१६९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न पाणिभ्यामुभाभ्यां च कण्डूय़ेज्जातु वै शिरः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
न पाणिलाभादधिको लाभः कश्चन विद्यते |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न पाणौ लवणं विद्वान्प्राश्नीय़ान्न च रात्रिषु |
८६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
न पाण्डवा न पाञ्चाला न च केशवसात्यकी |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
न पाण्डवाः प्रतिवलास्तव राजन्कथञ्चन |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
न पाण्डवाञ्श्रेष्ठतमान्निहन्ति; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
न पाण्डवानगणय़त्कथं स निहतः परैः ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
न पाण्डवानां नास्माकं तत्र कश्चिद्व्यदृश्यत |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
न पाण्डवानां नास्माकं योधः कश्चित्पराङ्मुखः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
न पाण्डवानां शिविरे कश्चित्सुष्वाप तां निशाम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
न पाण्डवानां समरे कश्चिदस्ति निवारकः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
न पाण्डवानामस्माभिः प्रतिदेय़ं यथोचितम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
न पाण्डवेय़ा न वय़ं नान्ये लोके धनुर्धराः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
न पातकं नावमतमृषिः सन्कर्तुमर्हसि |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
न पातकं भक्षणमस्य दृष्टं; सुरां पीत्वा पततीतीह शव्दः |
८६ क
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
न पादरजसा तुल्यो मनस्ते तेषु वर्तताम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न पापं प्रति पापः स्यात्साधुरेव सदा भवेत् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
न पापकं ध्यास्यति धर्मपुत्रो; धनञ्जय़श्चाप्यनुवर्तते तम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
न पापकृत्कश्चिदासीत्तस्मिन्राजनि शासति ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
न पापमभिजानासि साधु साध्वीव्रते स्थिता ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
न पापे कुरुते वुद्धिं निन्द्यमानोऽप्यनागसि ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
न पारजाय़ी न च पापकर्मा; न मे भय़ं विद्यते राक्षसेभ्यः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
न पारदारी पश्यति लोकमेनं; न वै गुरुघ्नो न मृषाप्रलापी |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
न पार्थस्य मृषोक्तानि कथय़न्ति नरा नृषु ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
न पार्थान्प्रतिवाधन्ते न जाने तत्र कारणम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
न पार्थिवमिदं राज्यं न च भोगाः पृथग्विधाः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
न पार्थिवाः सोढुमलं धनञ्जय़ं; गिरिप्रवोढारमिवानिलं द्रुमाः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
न पार्थिवेषु सर्वेषु य इमे तव सैनिकाः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
न पार्षतो दुरात्मासौ न शिखण्डी न सात्यकिः |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
न पारय़ाम्यभिगतान्विविधान्द्वारि वारितान् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१३३
राजो उवाच
न पावको विद्यते वै लघीय़ा; निन्द्रोऽपि नित्यं नमते व्राह्मणानाम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
न पावनतमं किञ्चित्सत्यादध्यगमं क्वचित् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
न पिता न च मे माता न यूय़ं भ्रातरस्तथा |
४० क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
न पिवेय़ं वलाद्वक्षो भित्त्वा चेद्रुधिरं युधि ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
नीलकण्ठ उवाच
न पिशाचा न गन्धर्वा न नरा न च राक्षसाः ||
७५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
न पुत्रः पितरं जज्ञे न पिता पुत्रमौरसम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
न पुत्रधनलाभेन न राज्येनापि विन्दति |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
न पुत्रफलभोक्ता हि राजर्षे पात्यते दिवः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात्कथञ्चन ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
दुःषन्त उवाच
न पुत्रमभिजानामि त्वय़ि जातं शकुन्तले |
७२ क