वन पर्व
अध्याय
१३३
राजो उवाच
न त्वा मन्ये मानुषं देवसत्त्वं; न त्वं वालः स्थविरस्त्वं मतो मे |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
न त्वा वारय़ितुं शक्तो वज्रपाणिरपि स्वय़म् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
न त्वा विगर्हे प्रतिकूलमेत; न्ममानय़ाद्धि व्यसनं व आगात् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वा विशति विप्रर्षे प्रसादात्परमेष्ठिनः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
न त्वा व्रवीमि कार्पण्यान्न प्राणपरिरक्षणात् |
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
न त्वां जरा वा रोगो वा वैवर्ण्यं चापि भामिनि |
४१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
न त्वां तेऽद्याभिगच्छन्ति चिरदृष्टां तपस्विनीम् |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
वसिष्ठ उवाच
न त्वां त्यजामि कल्याणि स्थीय़तां यदि शक्यते |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
न त्वां द्रोणो निगृह्णीय़ाज्जीवमाने मय़ि ध्रुवम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
न त्वां नित्यार्थिनो जह्युरक्षुद्राः सत्यवादिनः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
राजो उवाच
न त्वां परिभवन्व्रह्मन्प्रहसामि गुरुर्भवान् ||
५२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
न त्वां पृच्छामि विदुर यद्धितं मे; स्वस्ति क्षत्तर्मा तितिक्षून्क्षिणु त्वम् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
वृहस्पतिरु उवाच
न त्वां याजय़ितास्म्यद्य वृणु त्वं यमिहेच्छसि |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
न त्वां रामो रणे जेता जामदग्न्यः कथञ्चन |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
न त्वां वक्ष्यामि परुषं हनिष्ये त्वां वधक्षमम् ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
न त्वां व्रूय़ां रहिते जातु किं चि; दसूय़ा हि त्वां प्रसहेत राजन् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
न त्वां शस्त्रसमुद्योगे योग्यं मन्ये वृकोदर ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
न त्वां शूद्रमहं मन्ये भवितव्यं हि कारणम् |
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
द्रौपद्यु उवाच
न त्वां सखा वा भ्राता वा जानीय़ात्सङ्गतं मय़ा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
न त्वां सङ्कल्पय़िष्यामि समूलो न भविष्यसि ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वां सन्देष्टुमर्हामि भर्तॄन्प्रति शुचिस्मिते |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
न त्वां समीक्षते पार्थो नापि राजा युधिष्ठिरः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न त्वात्मनः सम्प्रदानं धनरत्नवदिष्यते |
१७३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
न त्वात्मनो गुणान्वक्तुमर्हामि विदितोऽस्मि ते ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
न त्वामकामां सुश्रोणीं समेष्ये चारुहासिनीम् ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वामद्य मुदा युक्तमहं देवितुमुत्सहे |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
न त्वामभिभविष्यन्ति वैद्या न च तपस्विनः ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वामभ्यनुजानामि प्रसादं कर्तुमर्हसि ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
नारद उवाच
न त्वामविषय़े भद्रे निय़ोक्ष्यामि कथञ्चन |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
गाव ऊचुः
न त्वामिच्छामि भद्रं ते गम्यतां यत्र रोचते ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
न त्वामेवंविधो भावः स्प्रष्टुमर्हति मानद |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
न त्वासौ वेद न त्वं तं कः सन्कमनुशोचसि ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
कुन्त्यु उवाच
न त्विदं केषुचिद्व्रह्मन्व्याहर्तव्यं कथञ्चन |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
न त्विदं सहसा व्रह्मन्प्रय़ोक्तव्यं कथञ्चन |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
दुर्योधन उवाच
न त्विदानीमहं मन्ये कार्यं युद्धेन कर्हिचित् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
न त्विमान्पृथिवीपालान्दातुं भीष्माय़ मृत्यवे |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न त्वीदृशं त्वय़ा वाच्यं विदुषि स्वार्थपण्डिते |
१५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
न त्वेकोऽहं वधे तेषां समर्थो वै सुरद्विषाम् ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
न त्वेतत्प्रतिसूय़ामि न हि सर्वं विधीय़ते |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
४१
भगवानु उवाच
न त्वेतत्सहसा पार्थ मोक्तव्यं पुरुषे क्वचित् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
न त्वेतदकुलीनासु नाधर्मिष्ठासु विद्यते |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
दुर्योधन उवाच
न त्वेतदद्भुतं मन्ये यत्ते महदिदं मनः |
८१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
दुर्योधन उवाच
न त्वेतदद्भुतं वीरा यद्वो महदिदं मनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
वलिरु उवाच
न त्वेतदनुरूपं ते यशसो वा कुलस्य वा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
न त्वेतन्मन्यसे पार्थ न ज्याय़ोऽस्ति धनादिति |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
न त्वेतान्युध्यमानान्वै हनिष्यामि कथञ्चन |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
न त्वेते हेतवः सन्ति ये केचिन्मूर्तिसंस्थिताः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
न त्वेनं त्रास्यसि मय़ा ग्रस्तमात्मानमेव च ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
न त्वेनं पीडय़ामास वलेन वलवत्तरः |
२४ क