द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
न चैव तादृशः कश्चिद्व्यूह आसीद्विशां पते |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
न चैव तेषां देवेश फलेनाहमिहागतः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
न चैव धारय़ामास गर्भं तेजोमय़ं तदा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
न चैव न प्रय़ुञ्जीत सङ्गं तु परिवर्जय़ेत् ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
न चैव न भविष्यामः सर्वे वय़मतः परम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
जनमेजय़ उवाच
न चैव पाण्डुपुत्राणां गमिष्यामि यथागतम् ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
७
विराट उवाच
न चैव मन्ये तव कर्म तत्समं; समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
धृतराष्ट्र उवाच
न चैव मामकं कञ्चिद्धृष्टं शंससि सञ्जय़ |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
न चैव मूर्ख धर्मेण केवलेनैव शक्यते |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
राम उवाच
न चैव युधि शक्नोमि भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
न चैव विवृतो मन्त्रः पृथाय़ास्तस्य वा मुने |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
न चैव शकितः कर्तुं यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
व्यास उवाच
न चैव शक्यं संय़न्तुं यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७१
पितर ऊचुः
न चैव सामरा लोका गमिष्यन्ति पराभवम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
न चैव ह्यभिसम्वन्धो दरिद्रं यो वुभूषति ||
९३ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
न चैवं कर्हिचित्कुर्यात्सापत्या च विशेषतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
न चैवं समवर्तंस्ते यथा त्वमिह वर्तसे ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
न चैवमिष्यते व्रह्म शरीराश्रय़सम्भवम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
न चैवाकल्पय़द्भागं दक्षो रुद्रस्य भारत ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
न चैवात्मावमन्तव्यः पुरुषेण कदाचन |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
न चैवात्र दय़ा कार्या मातुलोऽय़ं ममेति वै |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
न चैवात्राधिगच्छामि सर्वस्यास्य विनिश्चय़म् |
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
गौतम्यु उवाच
न चैवार्तिर्विद्यतेऽस्मद्विधानां; धर्मारामः सततं सज्जनो हि |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
न चैवालभथास्त्राणमभिपन्ना वलीय़सा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
न चैवाविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
न चैवास्ति तलं व्योम्नि न खद्योते हुताशनः ||
६२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
न चैवास्मात्प्रमोक्ष्यध्वं घोरात्पापान्नराधमाः ||
५९ ग
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
न चैवैतस्य मृत्युस्त्वं न कालः प्रत्युपस्थितः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
न चैवैतावता कार्यं मन्यन्त इति चापरे |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
न चैवैनं महात्मानमुत्सहामो निरीक्षितुम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
वैशम्पाय़न उवाच
न चैवैनां दूषय़ामास भानुः; सञ्ज्ञां लेभे भूय़ एवाथ वाला ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
न चैवैषा गतिः क्षेम्या न चान्या विद्यते गतिः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
६४
अर्जुन उवाच
न चैवोक्ता न चानुक्ता हीनतः परुषा गिरः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
न चैवोत्सहते स्थातुं कश्चिदग्रे महात्मनः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
न चैवोपय़िकी भार्या मानुषी कृपणा तव |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
न चैश्वर्यमदस्तेषां भूतपूर्वो महात्मनाम् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
न चैष तत्त्ववांस्तात निस्तत्त्वस्त्वेष वुद्धिमान् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
न चैष शक्तः पार्थानां यस्त्वदर्थमभीप्सति |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
न चैष शक्यः समरे जेतुं वज्रभृता अपि |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न चैष शक्यते युद्धे विशेषय़ितुमन्ततः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
न चैषा देहभेदेन हता स्यादिति मे मतिः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न चैषां चोदना काचिदस्तीत्येष विनिश्चय़ः |
९९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
न चैषां पुरुषाः केचिदाय़ुधानि गदाः शरान् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
न चैषां मैथुनो धर्मो वभूव भरतर्षभ |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
न चैषां विप्रिय़ं कार्यं ते हि वह्निशिखोपमाः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न चैषामप्ययो राजँल्लक्ष्यते प्रभवो न च |
१२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
न चोक्तवन्तावश्रेय़ः पुरस्तादपि किञ्चन |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
न चोच्छेदं कुलं याय़ाद्विस्तीर्येत कथं यशः |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
न चोत्सहे तपोविघ्नं कर्तुं ते धर्मचारिणि |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
धृतराष्ट्र उवाच
न चोत्सहे सुतं त्यक्तुं यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
७ ख