chevron_left  न्याय़लव्धैर्यथाarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
न्याय़लव्धैर्यथा सूक्ष्मैः श्रद्धापूतैः स तुष्यति ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
न्याय़विद्धर्मविदुषामितिहासविदां तथा ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
न्याय़वृत्तिर्हि तपसा दानवित्स्वर्गमश्नुते ||
७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
न्याय़वृत्तो वधो यस्तु सङ्ग्रामे युध्यतो भवेत् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
व्रह्मो उवाच
न्याय़ांस्तु शक्र प्रष्टव्यस्त्वय़ा वासव काम्यया ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
न्याय़ागतं धनं वर्णैर्न्याय़ेनैव विवर्धितम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
न्याय़ागतं राज्यमिदं कुरूणां; युधिष्ठिरः शास्तु वै धर्मपुत्रः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
न्याय़ागतस्य द्रव्यस्य वोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
न्याय़ेन युध्यमानौ हि तद्वै सत्यं व्रवीमि ते ||
६३ ख
विराट पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
न्याय़ेनानम्य च परान्वलाच्चानम्य दुर्वलान् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
न्याय़ेनावाप्तमन्नं तु नरो लोभविवर्जितः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
न्याय़ेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो निःसृता वय़म् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
न्याय़ेनोपार्जिता दत्ताः किमुतान्याः सहस्रशः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
न्याय़ेनोपार्जिताहाराः स्वकर्मनिरता वय़म् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
न्याय़ोपेतं व्राह्मणेभ्यो यदन्नं; श्रद्धापूतं गन्धरसोपपन्नम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
न्याय़ोपेता गुणोपेता देवद्विजपराः सदा |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
न्याय़ोपेता गुणोपेताः सर्वलोकहितैषिणः |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
न्याय़्यं तत्र परिप्रष्टुं गुप्तिं वृत्तिं च भारत ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
न्याय़्यं युक्तं च कौन्तेय़ प्रीतोऽहं तेन तेऽर्जुन ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
न्याय़्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
न्यूनतां धार्तराष्ट्राणां निन्दां चैव पुनः पुनः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
न्यूनतां पाण्डवानां च न मोहं गन्तुमर्हसि ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
न्यूनभावात्तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
न्यूनाः परेषां सप्तैव कस्मान्मे स्यात्पराजय़ः ||
६२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
नय़ मां तार्क्ष्य पूर्वेण यत्र धर्मस्य चक्षुषी ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
नय़ मां भगवन्साधो समुद्रमहिषीं प्रभो |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
नय़चारश्च विपुलो येन सर्वमिदं ततम् |
८० क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
नय़त्यस्मानतिक्रम्य योधाश्चेमे हतौजसः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
नय़नानां सहस्रैश्च विचित्राङ्गं महौजसम् |
३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
नय़नानां सहस्रैश्च विचित्रैरभिभूषितम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
नय़न्ति चैव ते सम्यगभिप्रेतमसंशय़म् ||
१३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
नय़न्ते ह्युत्पथं नार्यः कामक्रोधवशानुगम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
नय़न्त्यरिवशं सद्यो गणान्भरतसत्तम ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
नय़ा हि वहवः सन्ति शास्त्राण्याश्रित्य चिन्तिताः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
नय़ापनय़वेत्तारः स राजा राजसत्तमः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
नय़ामि दण्डधारस्य यमस्य सदनं प्रति ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
नय़ामि वः स्वाश्वपदातिकुञ्जरा; न्दिशं पितॄणामशिवां शितैः शरैः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
नय़ाम्यन्तं समासाद्य राधेय़ं वलगर्वितम् ||
३१ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
नय़िष्ये परिगृह्याहमिन्द्रप्रस्थमरिन्दम ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
नय़े वृहस्पत्युशनःसमं सदा; न चैनमस्त्रं तदपात्सुदुःसहम् ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
नय़ेन विधिदृष्टेन यदुपक्रमते परान् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
नय़ेषु कुशलं शूरमजय़न्क्षत्रिय़ांस्ततः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
नय़ो जय़ो वलं चैव विक्रमे सिद्धिमेष्यति ||
२० ग