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वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
नैषधं वरय़ामास भैमी धर्मेण भारत ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
नैषधस्तृषितो यत्र जलं शर्म च लव्धवान् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
नैषधस्य समीपे तु दमय़न्तीं पुनः पुनः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
नैषधाय़ ददौ शक्रः प्रीय़माणः शचीपतिः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
नैषधेनैवमुक्तस्तु पुष्करः प्रहसन्निव |
११ क
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
नैषधो दर्शय़ित्वा तु विकारमसकृत्तदा |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
नैषधोऽर्हति वैदर्भीं तं चेय़मसितेक्षणा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
नैषा कृतवती पापं नल सत्यं व्रवीमि ते ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
नैषा चालय़ितुं शक्या धर्मादस्मात्कथञ्चन ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
नैषा चेदिपतेर्वुद्धिर्यया त्वाह्वय़तेऽच्युतम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
नैषा तव ममैषेति तत्र तौ मन्युराविशत् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
नैषा न्याय़्या गुरुवृत्तिः |
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
नैषा वो नैष्ठिकी वुद्धिर्मता कर्तुं भुजङ्गमाः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
नैषां कश्चित्पृष्ठतो वा पलाय़न्वापि पातितः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
नैषां कश्चिद्वध्यते दृश्यरूप; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५०
आस्तीक उवाच
नैषां ज्ञानं विद्यते ज्ञातुमद्य; दत्तं येभ्यो न प्रणश्येत्कथञ्चित् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
नैषां दारेषु कुर्वीत मैत्रीं प्राज्ञः कथञ्चन |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
नैषां दुश्चरितं व्रूमस्तस्मान्मृत्युभय़ं न नः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
युधिष्ठिर उवाच
नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संय़ुगे पुरा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
नैषां पुत्रा वेदमधीय़ते च; यदा व्रह्म क्षत्रिय़ाः सन्त्यजन्ति ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
नैषां वभूव सम्प्रीतिस्तान्विचिन्तय़तां तदा |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९७
वैशम्पाय़न उवाच
नैषां शस्त्रप्रहारोऽस्ति पदं नेहास्ति कस्यचित् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
नैषां सर्वेषु लोकेषु कश्चिदस्ति व्यतिक्रमः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
नैषादिं पातय़ामास गजस्कन्धाद्विशां पते ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
नैषादिं श्वा समालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके ||
१८ ख
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
नैषादिमेकलव्यं च चक्रे कालिङ्गमागधान् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
नैषानृता मय़ा वाणी प्रोक्ता दर्पेण वा द्विजाः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
नैषामन्तं गतवान्पाण्डवानां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
नैषामुक्षा वर्धते जातु गेहे; नाधीय़ते सप्रजा नो यजन्ते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
नैषामुक्षा वर्धते नोत उस्रा; न गर्गरो मथ्यते नो यजन्ते |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
नैषामुक्षा वर्धते नोत वाहा; न गर्गरो मथ्यते सम्प्रदाने |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ३९
शिशुपाल उवाच
नैषितं पाद्यमस्मै तद्दातुमग्रे दुरात्मने ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
नैषोऽन्तरेण राजानं वीभत्सुः स्थातुमिच्छति |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
नैष्कर्म्यं न च लोकेऽस्मिन्मौर्तमित्युपलभ्यते ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
नैष्ठुर्यस्यावलेपस्य आत्मसम्भावनस्य च ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
नो चेत्कुरून्सञ्जय़ निर्दहेता; मिन्द्राविष्णू दैत्यसेनां यथैव |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
नो चेत्कुलं न चाचारो न धर्मोऽर्थः कुतः सुखम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
नो चेत्पापं परे लोके त्वमर्च्छेथास्ततोऽधिकम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
नो चेदिदं तव कर्मापराधा; त्कुरून्दहेत्कृष्णवर्त्मेव कक्षम् ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
नो चेदिह तु राजा त्वां गच्छेत्सर्वेण चेतसा ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
नो चेद्गच्छेत्सङ्गरं मन्दवुद्धि; स्ताभ्यां सुतो मे विपरीतचेताः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
नो चेद्धि वय़मप्येनं महीमनुशय़ीमहि |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
नो चेदय़मभावः स्यात्कुरूणां प्रत्युपस्थितः |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
नोक्तपुर्वमिदं वाक्यं यत्त्वं मामभिभाषसे ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
नोक्तपूर्वं च भगवन्मृषा ते किञ्चिदीश्वर |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
नोक्तपूर्वं नरैरन्यैर्न चान्यो यद्वदिष्यति ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
नोक्तपूर्वं मय़ा क्षुद्रमश्लीलं वा कदाचन |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
ऋचीक उवाच
नोक्तपूर्वं मय़ा भद्रे स्वैरेष्वप्यनृतं वचः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
नोक्तपूर्वं मय़ा मिथ्या स्वैरेष्वपि कदाचन |
१९ क