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वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
नीलश्च महता ग्राव्णा दूषणावरजं हरिः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
नीलश्च वीरधर्मा च भूमिपालश्च वीर्यवान् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
नीलश्च वैडूर्यमय़ः श्वेतश्च रजतप्रभः |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
नीलस्तथाङ्गलुव्धश्च शोभनो निरवग्रहः ||
८० ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
नीलस्य राज्ञः पूर्वेषामुपनीतश्च सोऽभवत् |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
नीलां पताकामाश्रित्य रथे तिष्ठन्तमुत्तर ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
नीलाः प्रसन्नाश्च जटाः सुगन्धा; हिरण्यरज्जुग्रथिताः सुदीर्घाः ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
नीलाङ्गाः कमलाङ्गाश्च मुण्डवक्त्रास्तथैव च ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
नीलाङ्गो लोहितग्रीवो गिरिवर्ष्मा भय़ङ्करः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
नीलाञ्जनचय़प्रख्यो जातरूपप्रभः क्वचित् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
नीलाञ्जनचय़प्रख्यो मदान्धो द्विरदो वभौ |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
नीलात्परतरं श्वेतं श्वेताद्धैरण्यकं परम् |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
नीलादनन्तरं चैव धृष्टकेतुर्महारथः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
विशोक उवाच
नीलाद्धनाद्विद्युतमुच्चरन्तीं; तथापश्यं विस्फुरद्वै धनुस्तत् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३१
सूत उवाच
नीलानीलौ तथा नागौ कल्माषशवलौ तथा |
७ क
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
नीलाम्वुदसमप्रख्यं मत्तमातङ्गविक्रमम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
नीलो नीलाम्वुदप्रख्यः सङ्क्रुद्धो द्रौणिमभ्ययात् |
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
नीलो माहिष्मतीवासी नीलवर्मधरस्तव |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
नीलोत्पलदलश्यामश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
नीलोत्पलनिभैर्वर्णै रक्तोत्पलनिभैस्तथा ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
नीलोत्पलमय़ीं मालां धारय़न्स पुरा यथा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
नीलोत्पलविमिश्रैश्च सरोभिर्वहुपङ्कजैः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात्प्रवाय़ति |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात्प्रवाय़ति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
नीलोत्पलसवर्णाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं कृशोदरम् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
नीलोत्पलसवर्णास्तु तपनीय़विभूषिताः |
५१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
नीलोत्पलाभा पुरदेवतेव; कृष्णा स्थिता मूर्तिमतीव लक्ष्मीः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
नीवारग्रहणं चैव फलमूलनिषेवणम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
नीवारमूलेङ्गुदशाकवृत्तिः; सुसंय़तात्माग्निकार्येष्वचोद्यः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
अश्व उवाच
नीहारसंवृतानीव वनानि गिरय़स्तथा ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
नीहारेण हि संवीतः शिश्नोदरपराय़णः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
नीय़तां परलोकाय़ साध्वय़ं कुलपांसनः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
नीय़तां परलोकाय़ साध्वय़ं कुलपांसनः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
नीय़ते रुद्रकन्याभिः सोऽन्तरिक्षं सनातनम् ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
नीय़मानानि सन्तारे हृतान्यासन्वितस्तय़ा |
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
नुदेद्वृद्धिसमृद्धी स प्रतिकूले नृपात्मज ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
नूनं गतिः कृतान्तस्य प्राज्ञैरपि सुदुर्विदा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
नूनं च तव नैवास्ति मन्युर्भरतसत्तम |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
नूनं च स गतः स्वर्गं जहि शोकं महामते |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
नूनं जनमदुष्टात्मा पण्डिताख्यां स गच्छति ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
नूनं जातो महावाहुर्यथा हन्ति स्म कौरवान् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
नूनं तत्रागतो देवो यथा तैर्वागुदीरिता |
४२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
नूनं तस्यैव देवस्य प्रसादात्पुनरेव तु |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
वृत्र उवाच
नूनं तु तस्य तपसः सावशेषं ममास्ति वै |
३० क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
नूनं ते भ्रातरः सर्वे त्वत्कथाभिः प्रजागरे |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
नूनं ते हृदय़ं काम वज्रसारमय़ं दृधम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
नूनं तेषां प्रभावेन विय़ोगं प्राप्तवत्यहम् ||
१६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
नूनं त्वा स्वगुणापेक्षं पूजय़ानं सुहृद्ध्रुवम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
नूनं तय़ोरनुमते हृदि हृच्छय़चोदितः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
नूनं दुर्योधनेनेदं विहितं पापकर्मणा |
३ क