chevron_left  निहन्यमानांarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
निहन्यमानां पाण्डूनां वलेन मम वाहिनीम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
निहन्यमानेष्वस्त्रेषु माय़या तेन रक्षसा |
९८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
निहन्या इति तं द्रोणः प्रत्युवाच हसन्निव ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
निहन्यात्समरे यत्तान्पाञ्चालान्पाण्डवैः सह ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
निहन्यात्सर्वतो दस्यून्न कामात्कस्यचित्क्षमेत् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
निहन्यादर्जुनः सङ्ख्ये किमु भीष्मं नराधिप ||
३८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १९५
वैशम्पाय़न उवाच
निहन्युः समरे सेनां देवानामपि पाण्डव ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
निहन्युर्भीष्म सङ्क्रुद्धाः पक्षिणस्तमिवाण्डजम् ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
निहिता यौवनाश्वेन राज्ञा हत्वा रणे रिपून् |
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
निहितौ गौतमस्तत्र तपसा तावविन्दत |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
निहीनकर्मा निरय़ं प्रपद्यते; त्रिविष्टपं गच्छति धर्मपारगः ||
७८ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
निहीनमुपतिष्ठेय़ं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
निहीनसेवितं मार्गं गमिष्यस्यचिरादिव ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
निहीनसेवी विप्रो हि पतति व्रह्मय़ोनितः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
निहीनात्कातराच्चैव नृपाणां गर्हितो वधः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
निह्नुवन्ति च ये तेषां समय़ं सुकृतं च ये ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विरूप उवाच
निय़ंस्यति त्वा नृपतिरय़ं धर्मानुशासकः ||
१०२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
निय़च्छ परय़ा वुद्ध्या चित्तमुत्पथगामि वै ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
निय़च्छ मन्युं पाञ्चाल्यात्प्रशाम्य शिनिपुङ्गव ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
निय़च्छ यच्छ संय़च्छ इन्द्रिय़ाणि मनो गिरम् ||
४६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
निय़च्छन्तः शरव्रातैर्मत्तं द्विपमिवाङ्कुशैः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
निय़च्छन्ति परां वुद्धिं शिष्टाचारान्विता नराः |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
निय़च्छन्नितरान्वर्णान्विनिघ्नन्सर्वदुष्कृतः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
निय़च्छेदं मनः पापात्सर्वलोकपराभवात् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
निय़च्छैतां मतिं राजन्धर्मार्थसुखनाशिनीम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
निय़तं कालपाशेन वद्धं शक्र विकत्थसे ||
८१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
निय़तं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्याय़ो ह्यकर्मणः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
निय़तं चोदिता धात्रा सिंहेनेव महामृगाः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
निय़तं व्रह्मभावाय़ यातं पूर्वं मनीषिभिः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
निय़तं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
युधिष्ठिर उवाच
निय़तं समवाप्स्यामि सर्वमेव यथेप्सितम् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
निय़तं सर्वभूतानां कालेनैव भवन्त्युत ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
निय़तं सर्वमित्रेषु वलवत्स्ववलेषु च ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
निय़तः सत्यवादी च व्रह्मलोके महीय़ते ||
१५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
निय़तस्त्वं नरश्रेष्ठ शृणु सर्वमशेषतः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
निय़तस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
निय़ता वाग्यताश्चैव पावकं शरणं यय़ुः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
निय़तात्मा नरः पूतो गच्छेत परमां गतिम् ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
निय़तात्मा महात्मा च सुव्रतः सुमहातपाः ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
गालव उवाच
निय़तात्मा महादेवमपश्यं सोऽव्रवीच्च माम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
नागभार्यो उवाच
निय़ताहारता नित्यं व्रतचर्या यथाक्रमम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
निय़तेभ्यो महीपाल स च पापात्प्रमुच्यते ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
निय़तेष्वप्रमत्तेषु शौचवत्सु महात्मसु ||
१३६ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
निय़तैः संय़ताहारैर्दमशौचसमन्वितैः ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
निय़तो जप चैकाग्रो धर्मस्त्वां समुपैष्यति |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
निय़तो दमदानाभ्यां सदा शिष्टैश्च संविशेत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
निय़तो निय़ताहारः षष्ठभक्तोऽप्रमादवान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
निय़तो निय़ताहारश्चीराजिनजटाधरः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
निय़तो यत्र धर्मो वै तमशङ्कः समाचर ||
१०९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
निय़तो वर्तय़ामास प्रजाहितचिकीर्षय़ा ||
१० ख