भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
निष्पपात ततस्तूर्णं पुत्रस्तव विशां पते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
निष्पपात महाघोरा स्मृतिः सा तस्य भारत |
३ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
निष्पपात महार्चिष्मान्दहन्कक्षमिवानलः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
निष्पिपेष क्षितौ क्षिप्रं पूर्णकुम्भमिवाश्मनि ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
निष्पिपेष क्षितौ राजन्परिश्रान्तो वुभुक्षितः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
निष्पिष्य पाणिना पाणिं सन्दष्टोष्ठपुटो वली |
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
निष्पिष्य भूमौ पाणिभ्यां समाजघ्ने वृकोदरः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
निष्पिष्यैनं वलाद्भूमौ पशुमारममारय़त् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
निष्पेतुर्विमलाः शक्त्यस्तैलधौताः सुतेजनाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
निष्प्रकम्पमनाकाशमनिर्देश्यमहीतलम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
निष्प्रकाशमिवाकाशं सेनय़ोः समपद्यत ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
निष्प्रचारं मनः कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वतः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
निष्प्रचारेण मनसा परं तदधिगच्छति ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
निष्प्रचारो निराहारो ग्लानः शिथिलवागपि |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
निष्प्रतीकारहृष्टश्च हुतभुग्विविधाकृतिः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
निष्प्रभश्चाभवत्सूर्यश्छन्नरश्मिस्तमोवृतः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
निष्प्रभाणि च तेजांसि व्रह्मा चैवासनाच्च्युतः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
निष्प्रभेऽस्मिन्निरालोके सर्वतस्तमसावृते |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
निष्प्रभोऽभ्युदिय़ात्सूर्यः सघोषो भूश्चचाल ह |
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
निष्प्रीतिं नष्टसन्तापं त्वमात्मानमुपाससे ||
१०७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
निष्फलो दृश्यसे कर्ण तच्च राजा न वुध्यते ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
निसर्गतस्ते तव वीर वान्धवाः; पुनश्च साम्ना च समाप्नुहि स्थिरम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
निसर्गप्रभवं किञ्चिन्न च तातानुशुश्रुम ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
निसर्गसर्गाभिरत कामेश परमेश्वर |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
निसर्गात्सर्वभूतानां सर्वभूतेश्वरेण मे |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
निसर्गाद्वरुणश्चापि व्रह्मणो यादसां पतिः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
निसृष्ट इव कालेन युगान्तज्वलनो यथा |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
निसृष्टं धृतराष्ट्रेण राज्यं प्राप्नोतु पाण्डवः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
निस्तत्त्वं पञ्चविंशस्य परमाहुर्निदर्शनम् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
निस्तरेदापदं कृच्छ्रां विषमस्थोऽपि पार्थिव ||
४२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
निस्तरेदेकभक्तेन वैशाखं यो जितेन्द्रिय़ः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
निस्तर्तव्यान्यथैतानि सर्वाणीति नराधिप |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
निस्तर्तुमापदः स्वेषु दण्डं कस्तत्र पातय़ेत् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
निस्तोय़ं तं च कलशं ददृशुः सर्व एव ते ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
निस्त्रिंशः कौरवस्यैष धर्मराजस्य धीमतः ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
निस्त्रिंशवेगाभिहतौ ततस्तौ पुरुषर्षभौ |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
निस्त्रिंशानां च पीतानां नीलोत्पलनिभाः प्रभाः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
निस्त्रिंशाभ्यां सुतीक्ष्णाभ्यामन्योन्यं सन्ततक्षतुः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
निस्त्रिंशाश्च व्यराजन्त विमलाम्वरसंनिभाः ||
२९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
निस्त्रिंशैः पट्टिशैः प्रासैर्नखरैर्लगुडैरपि ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
निस्त्रिंशैः पट्टिशैः प्रासैरय़स्कुन्तैः परश्वधैः ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
निस्त्रिंशैर्विमलैश्चापि स्वर्णपुङ्खैः शरैस्तथा ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
निस्त्रिंशोऽय़ं गुरुः पीतः सैक्यः परमनिर्व्रणः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
निहतं देवशत्रूणां यैर्वय़ं पूर्वतापिताः ||
७४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
निहतं द्रोणपुत्रेण पितुर्वधममृष्यता ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
निहतं नृपतिं दृष्ट्वा कुलूतानां यशस्करम् |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
निहतं पाण्डुपुत्रेण प्रमत्तं भूरिदक्षिणम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निहतं पितरं श्रुत्वा धृतराष्ट्रो जनाधिपः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
निहतं भीमसेनेन गदामुद्यम्य भारत ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
निहतं मेनिरे कर्णं पाण्डवेन महात्मना ||
४२ ख